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सेवा के दो दशक: प्रांजल वेलफेयर फाउंडेशन का 20वां स्थापना दिवस, दिव्यांग बच्चों और बुजुर्गों ने मिलकर रचा इतिहास ….

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सारंगढ़ संवाददाता – लक्ष्मीनारायण लहरे
 “सारंगढ़ नगर की इतिहास के पन्नों में दर्ज हुई सामाजिक सेवा कार्य “
सारंगढ़। आज ही के दिन सारंगढ़ नगर के वार्ड क्रमांक 15 स्थित दिव्यांगजन आवासीय विशेष विद्यालय में प्रांजल वेलफेयर फाउंडेशन का  नींव रखा गया था इस सामाजिक संस्था की नींव दिव्यांग बच्चों को गढ़ने के लिए स्थापना हुई थी पिछले दो दशक से अपने कार्य में सक्रियता के साथ आगे बढ़ रही है बिना किसी शोर गुल अपनी धीरे धीरे कदम बढ़ा रही है और सामाजिक सरोकारों के साथ अपनी पहचान बना रही है ।आज 20 वां स्थापना दिवस ‘करुणा से क्रांति तक’ की भावना के साथ मनाया गया। संस्था की अध्यक्ष  सामाजिक कार्यकर्ता श्रीमती हीरा देवी निराला द्वारा दिनांक 06/06/2006 को लगाए गए सेवा के इस पौधे ने आज बरगद का रूप ले लिया है।
एक संकल्प, दो पीढ़ियों का सहारा … 
 जब श्रीमती हीरा देवी निराला ने सिर्फ 3 दिव्यांग बच्चों के साथ इस फाउंडेशन की शुरुआत की थी, तब शायद किसी ने नहीं सोचा था कि 20 साल में यह संस्था सारंगढ़ की सामाजिक चेतना बन जाएगी। आज प्रांजल वेलफेयर फाउंडेशन दो छोरों पर काम कर रही है – बचपन को संवार रही है और बुढ़ापे को संबल दे रही है।
दिव्यांगजन आवासीय विशेष विद्यालय, सारंगढ़ यहां मंदबुद्धि, मूक-बधिर एवं दृष्टि बाधित 44 बच्चों को निःशुल्क शिक्षा, आवास, भोजन, चिकित्सा और व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है। ब्रेल लिपि, सांकेतिक भाषा, फिजियोथेरेपी, स्पीच थेरेपी के जरिए बच्चों को इस काबिल बनाया जा रहा है कि वे ‘दया’ नहीं ‘अधिकार’ मांगें।
सियान सदन वृद्धाश्रम, सारंगढ़ : …60 वर्ष से अधिक आयु के 19 निराश्रित, असहाय बुजुर्गों के लिए यह सिर्फ आश्रम नहीं ‘घर’ है। जिन बच्चों ने मुंह मोड़ लिया, उन्हें यहां ‘मां’ कहने वाली हीरा दीदी मिल गईं।
20वीं वर्षगांठ जब दादा-दादी और पोते-पोती एक हुए   
स्थापना दिवस का सबसे भावुक पल तब आया जब विद्यालय के दिव्यांग बच्चों और सियान सदन के बुजुर्गों ने मिलकर 20 पाउंड का केक काटा। 10 साल के मूक-बधिर दुर्गेश ने साइन लैंग्वेज में 80 वर्षीय शुकवारा दादी को ‘हैप्पी बर्थडे प्रांजल’ कहा, तो दादी की आंखें भर आईं।
दृष्टिबाधित छात्र रोहित ने ब्रेल में लिखा धन्यवाद पत्र पढ़ा – “हीरा मां, आपने हमें आंखें नहीं दीं, नजरिया दिया। दुनिया हमें बोझ कहती थी, आपने नायाब कहा।” वहीं वृद्धाश्रम के जमुना दादी बोली, “बेटे ने संपत्ति के लिए घर से निकाला था। यहां आकर पता चला कि रिश्ते खून से नहीं, कर्म से बनते हैं।”
श्रीमती हीरा देवी निराला: ’20 साल की तपस्या’…. 
अपने संबोधन में संस्था प्रमुख ने कहा, “06/06/2006 को शुरू करते समय मेरे पास न पैसा था, न बिल्डिंग। था तो सिर्फ दर्द – उन बच्चों का दर्द जिन्हें स्कूल एडमिशन नहीं देता, उन बुजुर्गों का दर्द जिनके अपने ही आंख फेर लेते हैं। समाज ने कहा ‘पागलपन है’, मैंने कहा ‘पुण्य है’।”
उन्होंने आगे कहा, “ये 20 साल आसान नहीं थे। कई रातें भूखे सोए, कई बार ताने सुने। पर जब कोई गूंगा बच्चा पहली बार ‘मां’ बोलता है, जब कोई लावारिस दादी मेरे आंचल में सिर रखकर सोती है – तो सारी थकान उतर जाती है।”
 घर-घर प्रांजल संस्था सारंगढ़ ब्लॉक के हर गांव में सर्वे कर छूटे हुए दिव्यांग बच्चों और लावारिस बुजुर्गों को संस्था से जोड़ना। हर वर्ष सर्वे के बच्चों को सामाजिक सरोकारों से जोड़ने का काम चल रहा है और लोग विश्वास भी जता रहे हैं ।
श्रीमती निराला ने कहा  “06/06/2006 को मैंने अकेले मशाल उठाई थी, आज मेरे साथ बच्चे और  बुजुर्ग हैं। जब तक सारंगढ़ में एक भी बच्चा ‘अभिशाप’ कहा जाएगा, एक भी मां-बाप ‘बोझ’ समझे जाएंगे, तब तक प्रांजल संस्था की मशाल जलती रहेगी।”
कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ, पर गूंजता रहा एक ही नारा – “न उम्र की सीमा हो, न मजबूरी का नाम हो, जहां करुणा हो, वहीं प्रांजल का धाम हो।”

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