Home चर्चा में चार वर्षों से विवाद, फिर भी कार्रवाई में ढिलाई? डाइट जांजगीर का...

चार वर्षों से विवाद, फिर भी कार्रवाई में ढिलाई? डाइट जांजगीर का स्थानांतरण प्रकरण बना प्रशासनिक व्यवस्था की बड़ी परीक्षा

5
0
जांजगीर-चांपा संवाददाता – राजेन्द्र जायसवाल
जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डाइट) जांजगीर में पिछले लगभग चार वर्षों से चले आ रहे प्रशासनिक विवाद ने अब शिक्षा विभाग की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। 11 जून 2026 को प्रभारी प्राचार्य श्री भुनेश्वर प्रसाद साहू की प्रतिनियुक्ति समाप्त करने का आदेश जारी होने के बावजूद लगभग दो माह बाद तक कार्यमुक्ति की कार्रवाई लंबित रहने के आरोपों ने पूरे मामले को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार,
11 जून 2026 को प्रतिनियुक्ति समाप्ति का आदेश जारी किया गया था। इसके बावजूद संबंधित अधिकारी को तत्काल कार्यमुक्त नहीं किया गया। आरोप है कि 16 जून से वे अवकाश पर चले गए तथा 16 से 19 जून की अवधि में अवकाश पर रहते हुए भी वित्तीय कार्यों का संचालन किया गया। यदि यह तथ्य अभिलेखों से प्रमाणित होते हैं, तो यह गंभीर प्रशासनिक एवं वित्तीय जांच का विषय हो सकता है।
दो माह की देरी ने बढ़ाए सवाल
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब प्रतिनियुक्ति समाप्ति का आदेश प्रभावी हो चुका था, तब कार्यमुक्ति में दो माह से अधिक का विलंब क्यों हुआ? यदि आदेश स्पष्ट था, तो नियमानुसार तत्काल कार्रवाई क्यों नहीं की गई? इस देरी के लिए उत्तरदायी अधिकारी कौन हैं और इसकी जवाबदेही किसकी तय होगी?
94 दिन के अवकाश को लेकर भी उठे प्रश्न
मामले में यह आरोप भी सामने आए हैं कि संबंधित अधिकारी का 94 दिनों का लघुकृत अवकाश शीघ्र स्वीकृत कर दिया गया, जबकि कार्यमुक्ति के लिए राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एससीईआरटी) रायपुर से अलग से मार्गदर्शन मांगा गया। इससे प्रशासनिक प्रक्रिया की एकरूपता और पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं।
आरोप यह भी है कि अवकाश आवेदन संस्था के माध्यम से प्रस्तुत न होकर निजी रूप से भेजा गया तथा संस्था के कर्मचारियों को यह जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई कि संबंधित अधिकारी किस आधार पर और किस स्थान पर अवकाश पर हैं। यदि यह तथ्य सही पाए जाते हैं, तो यह कार्यालयीन प्रक्रिया की दृष्टि से भी जांच का विषय बन सकता है।
अन्य अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल
मामले में डाइट के उप प्राचार्य एल. के. पांडे, जिला शिक्षा अधिकारी अशोक सिन्हा तथा उन्नत अध्ययन शिक्षण संस्थान (आईएएसई) की प्रभारी प्राचार्या मनीषा वर्मा की भूमिका को लेकर भी विभिन्न आरोप लगाए जा रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र जांच होना तथा सभी संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने आना आवश्यक है।
शिक्षा मंत्री ने दिया कार्रवाई का आश्वासन
बताया जा रहा है कि प्रदेश के शिक्षा मंत्री माननीय श्री गजेंद्र यादव ने पूरे प्रकरण में शीघ्र नियमानुसार कार्रवाई कराने का आश्वासन दिया है। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि प्रशासन इस मामले में कितनी पारदर्शिता और तत्परता से कदम उठाता है।
जिला शिक्षा अधिकारी का पक्ष
जिला शिक्षा अधिकारी अशोक सिन्हा ने कहा कि उन्हें कलेक्टर के माध्यम से प्रभारी प्राचार्य श्री भुनेश्वर प्रसाद साहू को कार्यमुक्त करने का लिखित आदेश प्राप्त हुआ है। उनके अनुसार, संबंधित प्रक्रिया पूर्ण करने के लिए दो दिन का समय दिया गया है तथा उसके बाद नियमानुसार कार्यमुक्ति की कार्रवाई की जाएगी।
डिप्टी कलेक्टर का कथित बयान भी चर्चा में
इस बीच डिप्टी कलेक्टर शिव चौधरी का एक कथित बयान भी चर्चा का विषय बना हुआ है। बताया जा रहा है कि उन्होंने कहा कि प्रभारी प्राचार्य का स्थानांतरण हो चुका है, लेकिन जब तक नए नियमित प्राचार्य की पदस्थापना नहीं हो जाती, तब तक वही प्रभारी के रूप में कार्य करते रहेंगे। इस कथित बयान को लेकर भी विभिन्न प्रकार की चर्चाएं और सवाल उठ रहे हैं। हालांकि इस कथन की आधिकारिक पुष्टि संबंधित प्रशासनिक अभिलेखों एवं आदेशों के आधार पर ही की जा सकती है।
जनहित में उठ रहे प्रमुख प्रश्न
11 जून 2026 के प्रतिनियुक्ति समाप्ति आदेश के बाद तत्काल कार्यमुक्ति क्यों नहीं हुई?
दो माह से अधिक की देरी के लिए जिम्मेदार कौन है?
अवकाश अवधि में यदि वित्तीय कार्य हुए, तो वे किस वैधानिक अधिकार के आधार पर किए गए?
94 दिनों का लघुकृत अवकाश किन नियमों के तहत स्वीकृत किया गया?
कार्यमुक्ति के लिए अलग से मार्गदर्शन लेने की आवश्यकता क्यों पड़ी?
कर्मचारियों को संबंधित अधिकारी की स्थिति की आधिकारिक जानकारी क्यों नहीं दी गई?
स्वतंत्र जांच की मांग
यदि लगाए गए आरोप दस्तावेजों, अभिलेखों और सक्षम जांच में सही पाए जाते हैं, तो पूरे प्रकरण की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए। दोषी पाए जाने वाले किसी भी अधिकारी अथवा कर्मचारी के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाए तथा जांच प्रतिवेदन सार्वजनिक किया जाए, ताकि शिक्षा विभाग की प्रशासनिक व्यवस्था पर जनता का विश्वास बना रहे।
शिक्षा जैसे संवेदनशील विभाग में पारदर्शिता, जवाबदेही और नियमों का समान रूप से पालन होना लोकतांत्रिक प्रशासन की मूल आवश्यकता है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि शासन एवं जिला प्रशासन इस बहुचर्चित प्रकरण में कितनी शीघ्रता और निष्पक्षता से निर्णय लेते हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here