आओ, चलो मुस्करा दें,
पल भर का भी भरोसा नहीं, चलो मुस्करा दें।
बहुत जी लिए औरों के लिए,
अब कुछ पल ख़ुद के लिए जीकर दिखा दें।
दुःख-दर्द ज़माने ने जो भी दिए,
चलो उन सभी को भुला दें और मुस्करा दें।
बहुत दूर चलकर आए हैं यहाँ तक,
चलो सारी ग़लतफ़हमियाँ भुला दें।
जाने-अनजाने कोई भूल हुई हो,
तो एक-दूजे को माफ़ कर बिसरा दें।
साथ रहे हैं, कभी मतभेद भी हुए,
चलो उन बातों को अब भुला दें।
कटु वचनों से चोट लगी हो कभी,
तो मन से क्षमा करें और मुस्करा दें।
क्षोभ, लोभ और मद से ऊपर उठें,
प्रतिरोध और गतिरोध सभी त्याग दें।
जो हुआ, वह बीते कल की बात है,
आज दिलों की हर दूरी मिटा दें।
दूर हों या पास, फ़र्क़ नहीं पड़ता,
चलो फिर एक-दूसरे से मिलें और मुस्करा दें।
किसी बात पर कोई रूठा हो अगर,
चलो फिर से उसे मना लें और मुस्करा दें।
ज़िंदगीभर कठिन राहों पर चलते रहे,
अब राहों को थोड़ा सुगम बना लें।
चलो बिना वजह भी मुस्करा दें,
दिल से दिल मिला लें और सुकून पहुँचा दें।
ऐसा न हो, कहते-सुनते ही रह जाएँ,
चलो आज खुलकर ठहाके लगा लें।
कहीं इतनी दूर न निकल जाएँ हम,
कि लौटकर फिर कभी आ न सकें।
इससे पहले कि वक़्त हाथ से निकल जाए,
आओ, आज एक-दूसरे को गले लगा लें—
और चलो, मुस्करा दें।
✍️: राजकुमार सोनी, नया रायपुर







