संवाददाता – राजेन्द्र जायसवाल
50 रुपये के स्टाम्प पेपर पर कथित इकरारनामे ने खड़े किए कई गंभीर सवाल, सरकारी सहायता है या निजी आश्वासन?
जिला जांजगीर-चांपा । चांपा थाना कस्टडी में शिव सहिस की मौत के बाद उठे सवाल अभी शांत भी नहीं हुए हैं कि अब परिवार को कथित तौर पर हर महीने 25 हजार रुपये जीवनभर देने के इकरारनामे ने पूरे मामले को एक नए सवाल के कटघरे में खड़ा कर दिया है। एक ओर परिवार ने अपना जवान सदस्य खोया है, वहीं दूसरी ओर राहत के नाम पर किए गए इस कथित वादे की कानूनी, प्रशासनिक और वित्तीय वैधता को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े हो गए हैं।
घटना के बाद परिजनों और स्थानीय लोगों का आक्रोश सामने आया। बताया जा रहा है कि परिस्थितियों को शांत करने तथा परिवार की मांगों पर सहमति बनाने के दौरान 50 रुपये के स्टाम्प पेपर पर एक इकरारनामा किया गया, जिसमें परिवार को प्रतिमाह 25 हजार रुपये की आर्थिक सहायता देने की बात कही गई है। यदि वास्तव में ऐसा इकरारनामा हुआ है, तो यह महज आर्थिक सहायता का विषय नहीं रह जाता, बल्कि यह सीधे तौर पर सरकारी धन, बजट और भुगतान की वैधानिक प्रक्रिया से जुड़ा गंभीर प्रशासनिक प्रश्न बन जाता है।
सबसे बड़ा सवाल—25 हजार रुपये आएंगे कहां से?
हर महीने 25 हजार रुपये यानी सालाना 3 लाख रुपये। यदि यह सहायता जीवनभर जारी रखने का वादा है तो आने वाले वर्षों में यह राशि करोड़ों रुपये तक पहुंच सकती है।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस भुगतान की जिम्मेदारी किस विभाग की होगी?
क्या पुलिस विभाग के पास ऐसा कोई वैधानिक प्रावधान या स्वीकृत फंड है, जिससे किसी मृतक के परिवार को जीवनभर प्रतिमाह 25 हजार रुपये दिए जा सकें?
यदि ऐसा कोई प्रावधान मौजूद है, तो उसका नियम क्या है? राशि किस मद से जारी होगी? किस अधिकारी के आदेश से भुगतान होगा? बजट में इसका प्रावधान किस शीर्ष के अंतर्गत होगा? और क्या इस सहायता के लिए शासन की औपचारिक स्वीकृति आवश्यक है?
यदि पुलिस विभाग के पास ऐसा कोई निर्धारित फंड नहीं है, तो फिर स्टाम्प पेपर पर किया गया यह कथित इकरारनामा किस अधिकार और किस वित्तीय आधार पर किया गया?
यही सवाल अब पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।
इकरारनामा हुआ तो सार्वजनिक हो नियम और भुगतान की व्यवस्था
किसी भी सरकारी विभाग द्वारा आर्थिक सहायता देने का निर्णय सामान्यतः निर्धारित नियमों, शासनादेश, बजट प्रावधान और सक्षम अधिकारी की स्वीकृति के आधार पर होता है। इसलिए यदि शिव सहिस के परिवार को प्रतिमाह 25 हजार रुपये देने का निर्णय वास्तव में प्रशासन अथवा पुलिस की ओर से लिया गया है, तो इसकी लिखित और वैधानिक स्थिति स्पष्ट करना प्रशासन की जिम्मेदारी है।
परिवार को केवल आश्वासन देकर मामला खत्म नहीं होना चाहिए। उन्हें यह भी बताया जाना चाहिए कि—
प्रतिमाह 25 हजार रुपये किस मद से दिए जाएंगे?
भुगतान कौन-सा विभाग करेगा?
भुगतान की अवधि और शर्तें क्या हैं?
राशि जारी करने वाला सक्षम अधिकारी कौन होगा?
क्या इसके लिए शासन से स्वीकृति ली गई है?
क्या बजट में इसका प्रावधान किया गया है?
इकरारनामे की कानूनी वैधता क्या है?
भविष्य में सरकार अथवा विभाग बदलने पर भुगतान की निरंतरता कैसे सुनिश्चित होगी?
इन सवालों का स्पष्ट जवाब सामने आना जरूरी है।
आज वादा, कल परिवार फिर सरकारी दफ्तरों के चक्कर न लगाए
सबसे बड़ी चिंता यह है कि घटना के तत्काल बाद भावनात्मक और तनावपूर्ण परिस्थितियों में किया गया कोई भी आश्वासन भविष्य में प्रशासनिक प्रक्रिया के सामने कमजोर न पड़ जाए।

आज यदि परिवार को 25 हजार रुपये प्रतिमाह देने की बात कही गई है, तो कल भुगतान रुकने पर जिम्मेदारी किसकी होगी?
क्या परिवार उस समय फिर पुलिस अधीक्षक कार्यालय, कलेक्टर कार्यालय, मंत्रालय और अन्य सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाएगा?
जिस परिवार ने अपना सदस्य खोया है, उसे सहायता के लिए भविष्य में संघर्ष करना पड़े, इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी।
इसलिए आवश्यकता केवल घोषणा की नहीं, बल्कि ऐसी ठोस व्यवस्था की है, जिससे सहायता का भुगतान कानूनी रूप से सुरक्षित और निरंतर बना रहे।
राजेश अग्रवाल ने उठाए गंभीर सवाल
कांग्रेस जिला अध्यक्ष राजेश अग्रवाल ने भी इस पूरे घटनाक्रम पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि शिव सहिस की मौत के बाद परिवार गहरे सदमे में है और ऐसे समय में उसे तत्काल आर्थिक एवं मानवीय राहत मिलना जरूरी है। लेकिन सवाल यह है कि पुलिस द्वारा कथित तौर पर हर महीने 25 हजार रुपये देने का जो इकरार किया गया है, उसकी व्यवस्था आखिर कहां से होगी?
अग्रवाल ने सवाल उठाया कि पुलिस विभाग के पास ऐसा कौन-सा फंड है, जिससे किसी परिवार को जीवनभर 25 हजार रुपये प्रतिमाह दिए जा सकें। यदि शासन या पुलिस विभाग के नियमों में ऐसी कोई व्यवस्था है तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि राशि किस मद से और किस प्रक्रिया के तहत दी जाएगी।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सक्ती में मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के कार्यक्रम के मद्देनजर पुलिस प्रशासन पर कानून-व्यवस्था और स्थिति को नियंत्रित करने का दबाव रहा होगा। ऐसे में परिजनों की मांगों पर आनन-फानन में सहमति बनाकर इकरार किए जाने की स्थिति बनी होगी।
हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित प्रशासनिक पक्ष का आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने आना आवश्यक है।
सरकार की संवेदनशीलता पर सवाल नहीं, व्यवस्था की पारदर्शिता जरूरी
किसी दुखी परिवार को तत्काल राहत देने का निर्णय मानवीय दृष्टि से स्वागत योग्य हो सकता है। लेकिन सरकारी व्यवस्था केवल भावनाओं से नहीं चलती। सरकारी धन का खर्च नियम, बजट और सक्षम स्वीकृति से ही होता है।
इसलिए यहां सवाल परिवार को सहायता देने के विरोध का नहीं है। सवाल यह है कि जो वादा किया गया है, उसे पूरा करने की वैधानिक और वित्तीय व्यवस्था क्या है?

यदि शासन के पास इसके लिए कोई विशेष प्रावधान है तो उसे सामने लाया जाए। यदि मुख्यमंत्री अथवा सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति से कोई विशेष सहायता स्वीकृत हुई है तो उसका आदेश सार्वजनिक किया जाए। और यदि अभी केवल स्थानीय स्तर पर आश्वासन या इकरार हुआ है, तो उसे विधिवत सरकारी आदेश में परिवर्तित कर परिवार के भविष्य को सुरक्षित किया जाए।
कस्टडी में मौत के सवाल से लेकर मुआवजे की व्यवस्था तक—हर कड़ी की निष्पक्ष जांच जरूरी
शिव सहिस की मौत का मूल सवाल अपनी जगह कायम है। कस्टडी में मौत किन परिस्थितियों में हुई, उसकी निष्पक्ष जांच कैसे होगी, जिम्मेदारी किसकी तय होगी और परिवार को न्याय कब मिलेगा—इन सवालों का जवाब भी जरूरी है।
इसके साथ ही आर्थिक सहायता के नाम पर किए गए कथित इकरारनामे की भी प्रशासनिक एवं वित्तीय जांच होनी चाहिए, ताकि भविष्य में कोई भ्रम न रहे।
25 हजार रुपये प्रतिमाह का वादा केवल कागज पर लिखे शब्द नहीं हैं। यह किसी परिवार के भविष्य से जुड़ी उम्मीद है।
इसलिए शासन-प्रशासन को अब स्पष्ट करना चाहिए कि यह सहायता किस फंड से, किस नियम के तहत, किस आदेश से और कितने समय तक दी जाएगी।
सबसे बड़ा सवाल यही है—शिव सहिस की मौत के बाद परिवार को न्याय और सम्मानजनक जीवन देने का जो वादा किया गया है, क्या वह केवल तत्कालीन हालात को शांत करने का आश्वासन था, या सरकार उसके लिए स्थायी, वैधानिक और बजटयुक्त व्यवस्था भी करेगी?
क्योंकि एक परिवार ने अपना सहारा खोया है; उसे कागज पर आश्वासन नहीं, बल्कि जिंदगीभर का भरोसा चाहिए।







