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गणेश जी की पूजा में तुलसी क्यों है वर्जित? जानिए पौराणिक कथा और मान्यता

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आज से 10 दिवसीय गणेश उत्सव का आरंभ हो चुका है। इस दौरान गणपति जी की विधिपूर्वक पूजा अर्चना की जाती है। बप्पा को मोदक, दूर्वा और लाल फूल अर्पित किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि गणेश जी की मूर्ति घर में स्थापित और पूजा करने स सुख-समृद्धि और संपन्नता आती है। व्यक्ति को सभी परेशानियों से शीघ्र छुटकारा मिल जाता है। इस साल 14 सितंबर से गणेश चतुर्थी का आरंभ हुआ है। गणेश चतुर्थी के दिन पंडाल और घरों में गणेश जी की मूर्ति स्थापित की जाती है।  बप्पा को कई तरह के भोग, फल और फूल चढ़ाया जाता है लेकिन उनकी पूजा में तुलसी चढ़ाना वर्जित होता है। तो आइए जानते हैं इसके पीछे का कारण और पौराणिक कथा।

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भगवान गणेश नदी के किनारे एकांत में बैठकर गहन ध्यान कर रहे थे। उसी समय वहां से माता तुलसी वहां से गुजरीं। भगवान गणेश के तेजस्वी स्वरूप और शांत व्यक्तित्व को देखकर तुलसी उनसे प्रभावित हो गईं। उनके मन में गणेश जी से विवाह करने की इच्छा उत्पन्न हुई और उन्होंने उनके सामने विवाह का प्रस्ताव रख दिया। लेकिन गणेश जी देवी तुलसी से शादी करने के लिए राजी नहीं हुए और उन्होंने विवाह प्रस्ताव विनम्रतापूर्वक ठुकरा दिया। इसके कारण माता तुलसी गणपति जी से नाराज हो गईं और उन्होंने गणेश जी को श्राप दिया कि, तुम्हारी दो शादियां होंगी।

माना जाता है कि इसके बाद गणेश जी ने भी माता तुलसी को श्राप दिया था कि तुम्हारा विवाह एक राक्षस से होगा। दोनों के बीच हुए इस श्राप-प्रतिश्राप के बाद तुलसी को अपनी भूल का एहसास हुआ। उन्होंने भगवान गणेश से क्षमा मांगी और अपने श्राप को वापस लेने का अनुरोध किया।

इसके बाद भगवान गणेश ने तुलसी को समझाया और उन्हें वरदान दिया। पौराणिक मान्यता के अनुसार, गणेश जी ने कहा कि तुलसी भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की अत्यंत प्रिय होंगी। उन्हें धार्मिक दृष्टि से विशेष सम्मान प्राप्त होगा और कलियुग में तुलसी को पवित्र एवं मोक्ष प्रदान करने वाली माना जाएगा। हालांकि इस वरदान के साथ भगवान गणेश ने यह भी कहा कि उनकी पूजा में तुलसी का प्रयोग नहीं किया जाएगा। इसी वजह से गणेश जी को तुलसी अर्पित करना वर्जित माना जाता है।

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