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भगवान कल्कि जयंती: अधर्म पर धर्म की पुनर्स्थापना का पर्व

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भगवान कल्कि जयंती हिंदू पंचांग के अनुसार आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाई जाती है। यह पर्व भगवान विष्णु के दसवें अवतार ‘कल्कि’ को समर्पित होता है, जिन्हें भविष्य में अधर्म के नाश और धर्म की पुनर्स्थापना के लिए अवतरित होने वाला बताया गया है। इस वर्ष कल्कि जयंती विशेष पुण्य फल देने वाली मानी जा रही है क्योंकि यह शुभ योगों के साथ आ रही है।

भगवान कल्कि का महत्व:

श्रीमद्भागवत पुराण, विष्णु पुराण और अन्य ग्रंथों में उल्लेख है कि कलियुग के अंत में जब धरती पर पाप, अन्याय और अधर्म चरम पर होगा, तब भगवान विष्णु कल्कि रूप में प्रकट होंगे। वे एक सफेद घोड़े पर सवार होकर, हाथ में तलवार लिए, पापियों का संहार करेंगे और सत्ययुग की शुरुआत करेंगे।

कल्कि जयंती पर पूजा विधि:

– इस दिन व्रत रखकर भगवान विष्णु की पूजा की जाती है।
– कल्कि रूप में भगवान की प्रतिमा या चित्र की स्थापना कर दीप जलाए जाते हैं।
– विष्णु सहस्रनाम और विष्णु स्तोत्र का पाठ कर धर्म की पुनर्स्थापना की कामना की जाती है।
– दान-पुण्य का विशेष महत्व होता है, विशेषकर अन्न, वस्त्र और गौ-दान।

आध्यात्मिक संदेश:

भगवान कल्कि जयंती हमें यह संदेश देती है कि चाहे कितनी भी अराजकता या अधर्म फैल जाए, अंत में जीत सदैव सत्य और धर्म की होती है। यह पर्व सत्कर्म, संयम और अध्यात्म की ओर प्रेरित करता है।

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