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नक्सली साये से आजाद हुआ कुतुल, 78 साल बाद फहराया गया तिरंगा, ग्रामीण बोले अब मिली असली आजादी

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-नारायणपुर के कई नक्सल प्रभावित कई गांवों में 79वां स्वतंत्रता दिवस समारोह नई सुबह लेकर आया.कुतुल गांव भी उन्हीं में से एक है.

78 साल बाद फहराया गया तिरंगा

जितेंद्र बिरंवार /नारायणपुर : नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ का ग्राम कुतुल कभी नक्सलियों की अघोषित राजधानी के लिए मशहूर था. आजादी के 78 साल बाद भी यहां के लोगों के लिए स्वतंत्रता दिवस का मतलब सिर्फ एक नाम था. क्योंकि नक्सली दहशत के कारण यहां तिरंगे की जगह काले झंडे को सलामी दी जाती थी. लेकिन आजादी का 79 वां साल यानी 15 अगस्त 2025 इस गांव के इतिहास में एक नए अध्याय के रूप में दर्ज हो गया. पहली बार यहां शान से तिरंगा लहराया. गांव की फिजाओं में दहशत और डर नहीं बल्कि राष्ट्रगान के साथ देश भक्ति की गूंज सुनाई दी.

कुतुल ने कई साल झेला नक्सली दंश : अबूझमाड़ के दुर्गम जंगलों में बसा ग्राम कुतुल में लंबे समय तक नक्सली प्रभाव रहा है. यहां पुलिस की पहुंच मुश्किल थी और विकास कार्य नाम मात्र के थे. नक्सलवाद के दबाव में स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्वों पर तिरंगा फहराने का मतलब था जान को जोखिम में डालना. 7 फरवरी 2025 को यहां पुलिस कैंप स्थापित किया गया . इसके साथ ही बदलाव की शुरुआत हुई. गांव को पक्की सड़क से जिला मुख्यालय से जोड़ा गया, स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं पर विशेष ध्यान दिया गया. सबसे अहम ये है कि इसी दौरान क्षेत्र के कुख्यात नक्सली ‘अरब’ ने आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौटने का निर्णय लिया. उसके बाद कई अन्य नक्सलियों ने भी पुलिस के सामने हथियार डाल दिए, जिससे पूरे इलाके में शांति का माहौल बनने लगा.

कुतुल में पहली बार फहराया तिरंगा
स्वतंत्रता दिवस का ऐतिहासिक उत्सव : 15 अगस्त की सुबह कुतुल में बच्चों ने अपने हाथों में तिरंगा थामा.इसके बाद आश्रम शाला से पुलिस कैंप तक प्रभात फेरी निकाली. नन्हें कदमों के साथ राष्ट्रप्रेम के गीतों की धुन ये संदेश दे रही थीं कि अब अबूझमाड़ बदल रहा है. कैंप परिसर में आईटीबीपी के कमांडेंट ने ध्वजारोहण किया और जवानों ने सलामी दी. राष्ट्रगान की गूंज से पूरा इलाका गूंज उठा. बारिश की बूंदों के बीच पारंपरिक आदिवासी परिधान पहने पुरुष और महिलाएं मांदरी नृत्य करते हुए उत्सव का हिस्सा बने.

नक्सली साये से आजाद हुआ कुतुल
ग्रामीणों की भावनाएं और बदला हुआ माहौल : गांव के शिक्षक सुखचंद मंडावी ने कहा कि असल मायनों में हमें आजादी 6 माह पहले मिली, जब पुलिस कैंप यहां पहुंचा और शांति स्थापित हुई. इसके बाद ही विकास कार्य शुरू हुए.ग्रामीणों ने भी माना कि पहले नक्सलवाद के डर से तिरंगा फहराना नामुमकिन था, लेकिन अब माहौल पूरी तरह बदल चुका है.

मुझे पूरा विश्वास है कि 31 मार्च 2026 से पहले हम कुतुल और आसपास के इलाकों से नक्सलवाद का पूरी तरह सफाया कर देंगे-सक्कु नूरेटी, कैंप प्रभारी

कुतुल गांव के बच्चों ने पहली बार देखा स्वतंत्रता दिवस
पूर्व नक्सली ने बताया क्या हुई गलती : वहीं पूर्व नक्सली और अब जिला पुलिस में हवलदार बने कसरु गोटा ने भावुक होकर कहा कि दो साल पहले तक यहां कोई आता-जाता नहीं था.तिरंगे की जगह काले झंडे फहराए जाते थे.लेकिन अब लोग नक्सली विचारधारा से दूर होकर विकास की राह पकड़ चुके हैं.

अबूझमाड़ के कई गांवों में तिरंगे का नया सवेरा : कुतुल के साथ ही इस वर्ष अबूझमाड़ के 12 ऐसे गांव हैं जहां पहली बार झंडा फहराया गया है. मोहंदी, कच्चापाल, इरकभट्टी, कोड़लियर, पद्मकोट, होरादी, बेड़माकोटि, नेलांगुर, गारपा, पांगुड और रायनार में भी पहली बार ध्वजारोहण हुआ है. कैंप स्थापना के बाद से ही इन सभी इलाकों में नक्सलवाद के लंबे दबदबे के बाद राष्ट्रीय पर्वों का उत्सव मनाना संभव हुआ है.

INDEPENDENCE DAY 2025
गांव के स्कूल से कैंप तक निकाली गई प्रभात फेरी राष्ट्रीय पर्व को लेकर महिलाओं में खुशी नक्सलियों की अघोषित राजधानी से तिरंगे की शान तक का यह सफर केवल कुतुल का नहीं, बल्कि पूरे अबूझमाड़ और बस्तर के लिए एक प्रेरणा है. जो ये बताती है कि जब सुरक्षा, विकास और भरोसा साथ आएं, तो सबसे गहरे अंधेरे में भी उजाले की किरण पहुंच जाती है. कुतुल में फहराता यह तिरंगा सिर्फ आजादी का प्रतीक नहीं, बल्कि उस नई सुबह का पैगाम है, जिसमें नक्सलवाद का अंत और विकास की शुरुआत दोनों नजर आते हैं.

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