भारत के इतिहास में ऐसे कई वीर योद्धा हुए हैं, जिन्होंने अपने अद्वितीय साहस, रणनीति और नेतृत्व से देश की दिशा और दशा को बदल दिया। ऐसे ही एक महान योद्धा थे श्रीमंत बाजीराव पेशवा प्रथम, जिनका जन्म 18 अगस्त 1700 को महाराष्ट्र के डुबेर गांव में हुआ था। वे मराठा साम्राज्य के चौथे पेशवा थे और अपने जीवनकाल में 41 युद्धों में भाग लेकर सभी में विजय प्राप्त की, जिससे उन्हें ‘अपराजेय योद्धा’ की उपाधि मिली।
प्रारंभिक जीवन और सैन्य प्रशिक्षण
बाजीराव के पिता, बालाजी विश्वनाथ, छत्रपति शाहू जी महाराज के पहले पेशवा थे। बाजीराव ने कम उम्र में ही युद्ध और राजनीति में रुचि दिखाई। छह वर्ष की आयु में तलवार को अपना प्रिय उपहार चुनना और तेज घोड़े की सवारी करना उनके साहसी स्वभाव का परिचायक था। चौदह वर्ष की आयु में उन्होंने पाण्डवगढ़ किले पर विजय प्राप्त की और पुर्तगालियों के खिलाफ नौसैनिक अभियानों में भाग लिया। इन उपलब्धियों के कारण उन्हें ‘सरदार’ की उपाधि मिली।
पेशवा के रूप में नेतृत्व
17 अप्रैल 1720 को, अपने पिता के निधन के बाद, 20 वर्षीय बाजीराव को पेशवा नियुक्त किया गया। उन्होंने हैदराबाद के निजाम, मालवा के दाऊदखान, उज्जैन के दयाबहादुर, गुजरात के मुश्ताक अली, चित्रदुर्ग के मुस्लिम अधिपति और श्रीरंगपट्टनम के सादुल्ला खाँ को पराजित कर मराठा साम्राज्य का विस्तार किया। उनकी रणनीति ‘जड़ पर प्रहार करो, शाखाएं स्वयं ढह जाएंगी’ पर आधारित थी।
पालखेड का युद्ध और अन्य विजय
1728 में पालखेड के युद्ध में, बाजीराव ने निजामुल्मुल्क को हराया, जिसे विश्व के सात श्रेष्ठतम युद्धों में गिना जाता है। उन्होंने बुंदेलखंड के राजा छत्रसाल को मोहम्मद खाँ बंगश की कैद से मुक्त कराया और नादिरशाह के दिल्ली लूट के बाद उसके वापस लौटने में भूमिका निभाई।
निधन और विरासत
लगातार युद्धों और सैन्य अभियानों के कारण बाजीराव का स्वास्थ्य कमजोर हो गया था। 28 अप्रैल 1740 को, नर्मदा नदी के तट पर रावेरखेड़ी में उनका निधन हो गया। उनकी समाधि स्थल पर एक स्मारक बनाया गया है, जिसे उनके पुत्र बालाजी बाजीराव ने बनवाया था। इतिहासकारों ने उन्हें ‘भारत का नेपोलियन’ और ‘भारत के इतिहास का सबसे महानतम सेनापति’ कहा है।









