भारत के ग्रामीण जीवन की आत्मा कहे जाने वाले पोला पर्व को छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और विदर्भ क्षेत्रों में बड़े उत्साह से मनाया जाता है। यह पर्व विशेष रूप से किसानों द्वारा अपने बैलों के प्रति आभार जताने और कृषि जीवन के मूल स्तंभों को सम्मान देने के लिए मनाया जाता है।
पर्व की तिथि और महत्त्व:
पोला पर्व भाद्रपद महीने की अमावस्या को मनाया जाता है। यह वह समय होता है जब खेतों में रोपाई का काम पूरा हो चुका होता है और किसान थोड़ी राहत महसूस करते हैं। ऐसे समय में वे अपने साथी – बैलों – को सम्मानित करते हैं, जिन्होंने पूरे सीजन मेहनत से खेतों में काम किया।
पर्व की परंपराएं:
– इस दिन बैलों को स्नान कराकर सजाया जाता है। उनके सींग रंगे जाते हैं, गले में घंटी और पैरों में सजावटी पट्टे बांधे जाते हैं।
– बैलों की पूजा की जाती है, उन्हें गुड़, चना और विशेष पकवान खिलाए जाते हैं।
– बच्चे मिट्टी के बैल (खिलौना पोला) से खेलते हैं और परंपरागत गीत गाते हैं।
– गांवों में शोभायात्राएं निकाली जाती हैं, जहां सजे-धजे बैल आकर्षण का केंद्र होते हैं।









