भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को श्री वराह जयंती मनाई जाती है, जो भगवान विष्णु के तीसरे अवतार ‘वराह’ की स्मृति में समर्पित है। इस दिन भगवान विष्णु ने वराह रूप में अवतार लेकर दैत्य हिरण्याक्ष से पृथ्वी को मुक्त कराया था।
वराह अवतार की पौराणिक कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, हिरण्याक्ष नामक दैत्य ने पृथ्वी का हरण कर उसे रसातल में छिपा दिया था, जिससे सृष्टि में संकट उत्पन्न हो गया। देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने वराह (सूअर) रूप में अवतार लिया। उन्होंने समुद्र में प्रवेश कर अपनी दाढ़ों पर पृथ्वी को उठाया और हिरण्याक्ष का वध कर पृथ्वी की पुनर्स्थापना की। [1]
वराह जयंती का धार्मिक महत्व
वराह जयंती धर्म, सत्य और न्याय की विजय का प्रतीक है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करने से भक्तों को धन, स्वास्थ्य, भय से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। [2]
पूजन विधि
1. प्रातः स्नान: शुद्ध जल से स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
2. मूर्ति स्थापना: भगवान वराह की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
3. अभिषेक: गंगाजल, दूध, शहद, घी और दही से पंचामृत तैयार कर अभिषेक करें।
4. कलश पूजन: पीतल के कलश में जल भरकर आम के पत्ते और नारियल रखें, पूजा के बाद इसे ब्राह्मण को दान करें।
5. भजन-कीर्तन: भगवान विष्णु के भजन, कीर्तन और श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ करें।
6. दान-पुण्य: गरीबों को वस्त्र, अन्न और धन का दान करें। [2]









