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गुरु अमरदास जी : सेवा, समर्पण और समानता के महान प्रतीक

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सिख पंथ के तीसरे गुरु, गुरु अमरदास जी (1479–1574) का जीवन समाज सुधार, सेवा और भक्ति का अद्वितीय उदाहरण है। उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें स्मरण करना न केवल श्रद्धा का विषय है, बल्कि उनके द्वारा दिखाए गए मार्ग पर चलने का संकल्प लेने का अवसर भी है।

जीवन परिचय

गुरु अमरदास जी का जन्म 5 मई 1479 को गोइंदवाल (पंजाब) में हुआ। वे मूल रूप से साधारण किसान परिवार से थे। 62 वर्ष की आयु में गुरु अंगद देव जी की शरण में आए और गहन भक्ति व सेवा भाव से शीघ्र ही उनके प्रिय शिष्य बने। 1552 ई. में उन्हें सिखों का तीसरा गुरु बनाया गया।

प्रमुख योगदान

1. लंगर प्रथा का विस्तार – गुरु अमरदास जी ने सामूहिक लंगर को सिख परंपरा का अभिन्न अंग बनाया। उनके अनुसार, जब तक कोई व्यक्ति लंगर में बैठकर संगत के साथ भोजन न कर ले, वह गुरु से नहीं मिल सकता। इससे समाज में ऊँच-नीच और जात-पात की दीवारें कमजोर हुईं।

2. सामाजिक सुधार – उन्होंने सती प्रथा, पर्दा प्रथा जैसी कुरीतियों का विरोध किया और स्त्रियों को समान अधिकार व सम्मान दिलाने पर बल दिया।

3. धार्मिक सुधार – गुरु अमरदास जी ने गुरबाणी का प्रचार-प्रसार किया और आध्यात्मिक जीवन में सच्चे कर्म, सेवा और भक्ति को सर्वोच्च माना।

4. गोइंदवाल साहिब की स्थापना – उन्होंने पंजाब के गोइंदवाल में एक पवित्र स्थल का निर्माण कराया, जो आगे चलकर सिख धर्म का महत्वपूर्ण तीर्थ बना।

पुण्यतिथि का महत्व

गुरु अमरदास जी का देहांत 1 सितंबर 1574 को हुआ। उनकी पुण्यतिथि पर सिख श्रद्धालु गुरुद्वारों में कीर्तन, अरदास और सेवा कार्य करते हैं। इस दिन का संदेश है – समानता, सेवा और सच्चाई।

“गुरु अमरदास जी का जीवन आज भी हमें यह प्रेरणा देता है कि सच्ची भक्ति केवल ईश्वर-प्रेम में नहीं, बल्कि समाज-सेवा, समानता और इंसानियत की रक्षा में है। उनकी पुण्यतिथि पर हमें उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए।”

 

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