Home मुख्य ख़बरें करमा पूजा 2025: प्रकृति, परंपरा और भाई-बहन के स्नेह का पावन उत्सव

करमा पूजा 2025: प्रकृति, परंपरा और भाई-बहन के स्नेह का पावन उत्सव

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करमा पूजा भारत के आदिवासी समुदायों का एक प्रमुख त्योहार है, जो खासकर झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, बिहार और मध्य प्रदेश के क्षेत्रों में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह पर्व प्रकृति, भाई-बहन के प्रेम, फसल की समृद्धि और लोक आस्था का सुंदर संगम है। यह त्योहार भाद्रपद मास की एकादशी या उसके आसपास मनाया जाता है, और 2025 में यह 5 सितंबर को पड़ रहा है।

करमा पूजा का महत्व:
करमा पूजा में करम पेड़ की टहनी की पूजा की जाती है, जिसे धरती और हरियाली की देवी का प्रतीक माना जाता है। यह पूजा विशेष रूप से महिलाएं और बहनें अपने भाइयों की लंबी उम्र और समृद्धि के लिए करती हैं। महिलाएं उपवास रखती हैं और रातभर करमा गीत गाकर जागरण करती हैं।

पौराणिक कथा:
लोककथाओं के अनुसार, करमा और धर्मा नाम के दो भाई थे। करमा धरती और वृक्षों की पूजा करता था जबकि धर्मा धन-संपत्ति में रमा रहता था। एक दिन धर्मा ने करमा की पूजा टहनी को नदी में बहा दिया। इससे देवता रुष्ट हो गए और उनके गांव में अकाल पड़ गया। करमा ने पुनः तप कर देवताओं को प्रसन्न किया और गांव में खुशहाली लौट आई। तभी से करमा पूजा की परंपरा शुरू हुई।

पूजन विधि:
– करमा पेड़ की टहनी लाकर मिट्टी में स्थापित की जाती है।
– महिलाएं पारंपरिक परिधान में करमा गीत गाते हुए पूजा करती हैं।

– करमा नृत्य रातभर चलता है जिसमें युवक-युवतियां वृत्ताकार होकर नृत्य करते हैं।
– अगले दिन टहनी को जल स्रोत में विसर्जित किया जाता है।

सांस्कृतिक महत्त्व:
करमा पूजा सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक पहचान भी है। यह त्योहार समुदाय को जोड़ता है, युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़ता है और प्रकृति के साथ सामंजस्य का संदेश देता है।

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