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महिला आयोग की संवेदनहीनता : न्याय की प्रतीक्षा में तीन वर्ष व्यतीत करने वाली रमा गोस्वामी को मिला अन्याय

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जांजगीर-चांपा- संवाददाता – राजेन्द्र जयसवाल

जिला जांजगीर-चांपा
दिनांक 12 सितम्बर 2025 को राज्य महिला आयोग, रायपुर की टीम कलेक्ट्रेट सभा कक्ष, जांजगीर में विभिन्न मामलों की सुनवाई हेतु उपस्थित हुई। इन्हीं मामलों में डी.ई.आई.टी. जांजगीर की व्याख्याता रमा गोस्वामी और प्रभारी प्राचार्य बी.पी. साहू का प्रकरण भी शामिल था। यह वही मामला है जो वर्ष 2023 से लंबित था और जिसमें रमा गोस्वामी लगातार न्याय की प्रतीक्षा कर रही थीं।

तीन वर्ष का इंतजार और सिर्फ 15 मिनट का “न्याय”

रमा गोस्वामी ने 8 मई 2023 को आवेदन प्रस्तुत किया था। लगभग तीन वर्ष तक लगातार प्रताड़ना झेलने और न्याय की राह देखने के बाद उन्हें 12 सितम्बर 2025 को अचानक पुलिस द्वारा मात्र आधे घंटे पहले सूचना दी गई कि उनकी सुनवाई है। बिना पूर्व लिखित सूचना और बिना दस्तावेज प्रस्तुत करने का समय दिए, आनन-फानन में उन्हें सुनवाई में बुलाया गया।

सभा कक्ष में सुनवाई के दौरान बी.पी. साहू ने स्वयं अपनी गलती स्वीकार करते हुए सार्वजनिक रूप से माफी मांगी। यह स्वीकारोक्ति अपने आप में इस बात का प्रमाण थी कि महिला कर्मचारी के साथ अन्याय हुआ। लेकिन आश्चर्य की बात यह रही कि महिला आयोग की अध्यक्ष डॉ. किरणमयी नायक ने इस गंभीर मामले को नजरअंदाज करते हुए मात्र स्थानांतरण की धमकी और जबरन कोरे कागज पर हस्ताक्षर कराकर मामला निपटा दिया।

   

न्याय के नाम पर “स्थानांतरण” का हथियार

रमा गोस्वामी ने आयोग के समक्ष स्पष्ट कहा कि वह तीन वर्षों से प्रताड़ना सह रही हैं, मानसिक रूप से टूट चुकी हैं और जिम्मेदार व्यक्ति पर कार्यवाही चाहती हैं। लेकिन महिला आयोग ने उनकी बातों को अनसुना कर दिया और कहा – “दोनों का स्थानांतरण कर देंगे।”
यह फैसला न केवल संवेदनहीन था, बल्कि यह भी दर्शाता है कि महिला आयोग जैसी संस्था, जिसका गठन महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए हुआ है, स्वयं महिलाओं की आवाज को दबाने का कार्य कर रही है।

महिला विरोधी निर्णय – समाज में गलत संदेश

इस फैसले से यह संदेश गया कि –

कोई पुरुष किसी महिला के साथ दुर्व्यवहार करके बाद में माफी मांग ले तो वह बच सकता है।

महिला की पीड़ा, उसके चरित्र हनन और मानसिक उत्पीड़न को न्याय का आधार नहीं माना जाएगा।

महिला को ही स्थानांतरण की धमकी देकर चुप कराया जाएगा।

यह न केवल रमा गोस्वामी के साथ अन्याय है, बल्कि पूरे समाज की हर कामकाजी महिला के साथ विश्वासघात है।

महिला आयोग की भूमिका पर गंभीर प्रश्नचिन्ह

महिला आयोग का उद्देश्य महिलाओं को सुरक्षा और न्याय दिलाना है, लेकिन यहां मामला उल्टा दिखाई दिया।

आवेदक से न तो सही तरीके से लिखित बयान लिया गया,

न ही दस्तावेज प्रस्तुत करने का मौका दिया गया,

मात्र 15–20 मिनट में “न्याय” कर दिया गया।

इतना ही नहीं, आयोग की अध्यक्ष द्वारा “रहने दीजिए, बहुत लंबा है” कहकर महिला की बात काटना आयोग की संवेदनहीनता को उजागर करता है।

अन्यायपूर्ण और महिला विरोधी फैसला

यह घटना इस बात की मिसाल बन गई कि पुरुष प्रधान समाज में जब महिला से ही महिला न्याय छीन ले, तो एक पीड़िता की लड़ाई कितनी कठिन हो जाती है।

रमा गोस्वामी जैसी पीड़ित महिला ने जब न्याय की आस में तीन वर्षों तक इंतजार किया और आयोग के समक्ष अपने दुख-दर्द रखे, तब उनसे न्याय छीन लिया गया। यह न केवल व्यक्तिगत स्तर पर उनका अपमान है, बल्कि पूरे महिला समाज का अपमान है।

आज जरूरत है कि इस अन्यायपूर्ण निर्णय की न्यायपालिका और राज्य सरकार गंभीरता से समीक्षा करे और दोषी अधिकारी पर कठोर कार्यवाही सुनिश्चित करे। अन्यथा यह उदाहरण समाज में गलत संदेश देगा और महिलाएं अपने अधिकारों और सुरक्षा को लेकर और असुरक्षित महसूस करेंगी।

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