आरंग संवाददाता – सोमन साहू
इस वर्ष किसानों के लिए खेती-किसानी का काम घाटे का सौदा साबित हो रहा है। बोनी का समय अनुकूल नहीं रहा, किसी तरह पौधे तैयार भी किए तो उन पर भूरा माहो और माइट जैसे कीटों का भारी प्रकोप टूट पड़ा। कीट नियंत्रण के लिए किसानों को दो-दो, तीन-तीन बार महंगी दवाइयाँ डालनी पड़ रही हैं, लेकिन फिर भी राहत नहीं मिल पा रही।

जहाँ कई वस्तुओं पर जीएसटी घटाई गई है, वहीं कृषि में उपयोग होने वाली रासायनिक दवाइयों पर किसानों को कोई राहत नहीं मिली है। किसान शिकायत कर रहे हैं कि प्रकृति के साथ सरकार भी उनसे रूठ गई है।

आने वाला एक महीना खेती के लिए परीक्षा की घड़ी साबित हो सकता है। तेज बारिश के चलते धान की फसल पानी में डूब रही है और खेतों में पौधे गिरने लगे हैं।

किसानों का कहना है कि गाँवों में उनका दर्द बाँटने कोई अधिकारी नहीं पहुँच रहा। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के अंतर्गत भले ही जबरन बीमा कराया गया हो, लेकिन नुकसान होने पर बीमा कंपनी के अधिकारी खेतों तक आने से कतराते हैं। किसान आरोप लगाते हैं कि उनकी फसल नष्ट होने पर भी बीमा कंपनियाँ मोबाइल बंद कर लेती हैं और उन्हें मुआवजा देने से बचती हैं।







