छठ महापर्व की शुरुआत ‘नहाय-खाय’ से होती है, जो आस्था, शुद्धता और आत्मसंयम का प्रतीक है। यह दिन व्रतधारियों के लिए बेहद पवित्र माना जाता है। कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को नहाय-खाय मनाया जाता है, जो छठ पूजा का पहला दिन होता है। इस दिन व्रती गंगा या किसी पवित्र नदी या तालाब में स्नान कर शुद्ध होते हैं और सात्विक भोजन करते हैं।
नहाय-खाय का अर्थ होता है – नहाना और शुद्ध भोजन करना। इस दिन व्रती एक समय भोजन करते हैं, जिसमें कद्दू की सब्जी और चावल-चना दाल का भात विशेष रूप से शामिल होता है। भोजन मिट्टी के चूल्हे पर आम की लकड़ी और गाय के गोबर से बने उपले जलाकर पकाया जाता है, जिससे उसका पवित्रता बनी रहे।
इस दिन से ही व्रती एकदम सात्विक आहार पर आ जाते हैं और अगले चार दिनों तक पूरी तरह नियमों और संयम का पालन करते हैं। नहाय-खाय से ही छठी मैया की पूजा का प्रारंभ होता है और घर-परिवार में पवित्रता और सकारात्मकता का वातावरण बनता है।
छठ महापर्व सिर्फ एक पूजा नहीं, बल्कि प्रकृति, नारी शक्ति और सूर्य उपासना का महोत्सव है, जिसकी शुरुआत नहाय-खाय से होकर षष्ठी को सूर्य को अर्घ्य और सप्तमी को उगते सूर्य को अर्घ्य देने के साथ पूर्ण होती है।









