Home चर्चा में कन्वर्जन के खिलाफ एक और गांव हुआ लामबंद

कन्वर्जन के खिलाफ एक और गांव हुआ लामबंद

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बस्तर संवाददाता – अर्जुन झा

ग्रामसभा का फैसला, गांव में पादरियों की एंट्री बैन 
 लगातार हो रहे धर्मांतरण पर रोक लगाने एकजुट हुए सिड़मुर गांव के ग्रामीण 

जगदलपुर। कन्वर्जन के खिलाफ शुरू हुई मुहिम अब कांकेर व सुकमा के बाद बस्तर जिले के आदिवासी समुदाय के बीच भी पहुंच गई है। आदिवासियों ने अब एकजुटता दिखाते हुए कन्वर्जन का पुरजोर विरोध शुरू कर दिया है। गांव गांव में पास्टर, पादरियों के प्रवेश पर पाबंदी लगाने का सिलसिला सा चल पड़ा है। बदलाव की यह बयार कांकेर जिले से शुरू होकर बस्तर और सुकमा जिलों तक पहुंच चुकी है। इसका बेहतर परिणाम भी सामने आने लगा है।

विदित हो कि बस्तर जिले में ही हजारों चर्च बन चुके हैं। हाउस चर्च के माध्यम से शहर जगदलपुर में कन्वर्जन का खेल खुलकर खेला जा रहा है लेकिन सनातन रक्षा का दावा करने वाले संगठन बिल्कुल सामने नहीं आ रहे हैं, बल्कि आम ग्रामीण ही अब खुलकर इसका प्रतिकार कर रहे हैं। बस्तर जिला मुख्यालय जगदलपुर से लगे सिडमुर गांव में धर्मांतरण की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए ग्रामसभा ने एक ऐतिहासिक निर्णय लिया है। गांव के सभी वर्गों के लोगों ने एकजुट होकर प्रस्ताव पारित किया है कि अब बाहरी पादरी या धर्म प्रचारक गांव की सीमा में प्रवेश नहीं कर सकेंगे। यह निर्णय ग्रामसभा में उपस्थित गांव के सभी 275 परिवारों की सर्वसम्मति से लिया गया है। ग्रामीणों और ग्राम प्रतिनिधियों ने स्पष्ट किया है कि यह निर्णय किसी धर्म विशेष के विरोध में नहीं है, बल्कि ग्रामीण एकता और सांस्कृतिक परंपराओं की रक्षा लिए उठाया गया कदम है। वहीं गांव में पहले से रह रहे कुछ ईसाई परिवार इस निर्णय को लेकर असमंजस में हैं और प्रशासन से स्थिति स्पष्ट करने की मांग कर रहे हैं।

ग्राम पंचायत के अनुसार, भविष्य में यदि कोई बाहरी व्यक्ति गांव में आकर धार्मिक प्रचार या धर्मांतरण की गतिविधियों में संलिप्त पाया जाता है तो उसके खिलाफ सामूहिक निर्णय लेकर कार्रवाई की जाएगी। ग्रामीणों का साफ कहना है कि गांव में सामाजिक एकता, पारंपरिक विश्वास और आपसी सौहार्द्र बनाए रखना है। ग्रामसभा में मौजूद बुजुर्गों और प्रतिनिधियों ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों से गांव में बाहरी लोगों की आवाजाही बढ़ी थी। बताया गया है कि ये लोग ग्रामीणों को ईसाई धर्म अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे थे। इससे गांव के पारंपरिक, सांस्कृतिक और सामाजिक ढांचे पर खतरा मंडराने लगा था। ग्रामीणों के अनुसार, पिछले 10 से 12 वर्षों में गांव में ईसाई समुदाय के अनुयायियों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ी है, जिससे मतभेद और असंतोष की स्थिति बनती जा रही थी। सिड़मुर गांव की ग्रामसभा ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर बहरी पादरियों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया है। इसका उद्देश्य बढ़ते धर्मांतरण को रोककर सामाजिक समरसता बनाए रखना है। ग्रामसभा ने यह भी कहा कि सिड़मुर गांव की परंपरा और आस्था से किसी को खिलवाड़ नहीं करने दिया जाएगा। सिड़मुर गांव के सभी 275 परिवारों ने सामूहिक रूप से इस प्रस्ताव का समर्थन किया। पंचायत प्रतिनिधियों ने कहा- यह निर्णय किसी समुदाय के खिलाफ नहीं, बल्कि गांव की शांति और एकता की रक्षा के लिए है।

बलराम है मास्टर माइंड
गांव के ही पादरी बलराम कश्यप जो खुद कन्वर्टेड है और उसका साथी भोलाराम नागलंबे समय से गांव के लोगों को बहला फुसला करकन्वर्ट कराते आ रहे थे।ग्रामीण उन्हें कई बार समझाईश दे चुके थे मगर वे अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे थे। अंततः राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ द्वारा गांव में गठित ग्राम रक्षा समिति के सह संयोजक पीलाराम सोनी उनके सहयोगी पाकलू राम भारती, कार्तिक गोयल एवं चैतूराम नाग की पहल पर गांव में सार्वजनिक बैठक हुई। इस बैठक में कड़ा फैसला लेते हुए कन्वर्जन का खेल चलाने वालों पर नकेल कस दी गई।

सुकमा में हो चुकी है बड़ी पहल
उल्लेखनीय है कि बस्तर संभाग में कन्वर्टेड लोगों की घर वापसी भी तेज गति से जारी है। कन्वर्टेड हो चुके लोग अपने मूल धर्म में वापस लौट रहे हैं। कन्वर्ट हो चुके लोगों की घर वापसी कराने के लिए अब भाजपा के लोग भी आगे आ रहे हैं। बस्तर संभाग के कांकेर जिले के अनेक गांवों से धर्मांतरित हो चुके लोगों की मूल धर्म में वापसी का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह अब सुकमा जिले तक पहुंच चुका है।सुकमा जिले ग्राम पंचायत छिंदगढ़ रानीबाहर में एक समुदाय द्वारा ग्रामवासियों को बहला फुसला कर व प्रलोभन लालच देकर कई परिवारों का जबरन धर्मांतरण कराया गया था। इनमें से 6 परिवारों के लगभग 26 लोगों ने घर वापसी कर अपने पुराने…

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