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यहां आश्रम अधीक्षक पद के लिए लगती है बोली!

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= आदिम जाति विकास विभाग में गजब गफलत =
= जो दे ज्यादा माल, उसे अफसर कर देते हैं निहाल =
-अर्जुन झा-
बकावंड। विकासखंड बकावंड में आदिम जाति विकास विभाग ने शिक्षण संस्थाओं को व्यापार के केंद्र में तब्दील कर दिया है। इस विभाग में आश्रम एवं छात्रावासों के अधीक्षक पदों के लिए बोली लगती है। जो शिक्षक या कर्मचारी ज्यादा माल देता है, उसे अधिकारी अधीक्षक पद देकर निहाल कर देते हैं। विकासखंड में यह खेल धड़ल्ले से चल रहा है।
शिक्षा के स्तर को ऊंचा उठाने के लिए सुशासन सरकार अथक प्रयास कर रही है। वहीं बकावंड विकासखंड में आदिम जाति विकास विभाग के अधिकारी निजी हित के लिए शिक्षा व्यवस्था को व्यापार में बदल रहे हैं। यहां आश्रम अधीक्षक पद के लिए बोली लगती है। विभाग के जो शिक्षक ज्यादा राशि देते हैं, उन्हें आश्रम या छात्रावास का अधीक्षक बना दिया जाता है। आदिम जाति कल्याण विभाग के उपायुक्त गणेश शोरी की सहमति और मंडल संयोजक लीलाधर की लीला से एक प्राथमिक शाला के प्रधान अध्यापक को दो-दो छात्रावासों का प्रभारी बना कर का शासकीय धन का दोहन किया जा रहा है। जानकारी के अनुसार सोरागुड़ा के प्रधान अध्यापक को आदिम जाति विकास विभाग के सहायक आयुक्त द्वारा मंडल संयोजक लीलाधर की सहमति पर एक नहीं दो छात्रावासों का प्रभारी अधीक्षक नियुक्त कर दिया गया है। जबकि प्रधान पाठक को तनख्वाह शिक्षा विभाग द्वारा दी जाती है।

बच्चों के हक पर डाका
अपने पद का दुरुपयोग अधिकारी अपने फायदे के लिए कैसे करते हैं, यह इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। सवाल यह भी उठता है कि एक छात्रावास का कार्यभार देने के बाद दूसरे छात्रावास भी प्रभारी बनाना क्या जागीरदारी प्रथा जैसा नहीं है? ऐसा कारनामा बकावंड के दर्जनों छात्रावासों में आपसी मिलीभगत से किया गया है। बताते हैं कि बकायदा मालदार छात्रावासों के अधीक्षक बनने बोली लगती है। अब यह समझने की बात है कि इससे शिक्षा का स्तर कैसे सुधरेगा? दरअसल आश्रम छात्रावासों के विद्यार्थियों के नाश्ता, भोजन और दीगर व्यवस्थाओं के लिए शासन से बड़ा फंड मिलता है।. इस फंड का जमकर दुरूपयोग किया जाता है। विद्यार्थियों को ढंग का भोजन व नाश्ता नहीं दिया जाता, सस्ती और सड़ी गली सब्जियां परोसी जाती हैं, नहाने व कपड़े धोने के लिए साबुन नहीं दिए जाते, बिस्तर, चादर भी फटे पुराने ही दिए जाते हैं। इन सभी जरूरतों की राशि की बंदरबांट कर ली जाती है। इसी कमाई के लिए अधीक्षक पद की बोली लगती है।

उधार के सिंदूर से सुहागन
कहा तो यह भी जाता है कि उधार के सिंदूर से आदिम जाति विकास के छात्रावास आश्रमों को सुहागन बनाए रखने की कवायद की जाती है। रसोईये और अन्य कर्मचारी दाल, तेल, मिर्च मसाले और सब्जियां गांव की दुकानों से उधार में लेकर बच्चों का पेट जैसे तैसे भरते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि बच्चों के भोजन, तेल, साबुन और दीगर जरूरतों के लिए शासन से मिलने वाला फंड आखिर किसकी जेब में चला जाता है? उधार में बच्चों को तो घी नहीं पिलाया जाता होगा, अलबत्ता विभाग के वो होशियार शिक्षक जिनकी राजनीतिक पहुंच मजबूत है वह जरूर इस विभाग में केवल मलाई खाने आते हैं। विभाग के अधिकारी भी विशुद्ध बोली के साथ छात्रावासों को इनके हवाले कर देते हैं। बच्चों को कम से कम सुविधा देकर उनके हिस्से की रकम मिल बांटकर हजम करने का सिलसिला यहां चल रहा है।

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