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उरगा थाने की मनमानी से दहशत में तरदा ग्राम के नाबालिग बच्चे, प्रशासन की चुप्पी सवालों के घेरे में

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संवाददाता – राजेन्द्र जायसवाल
 जिला कोरबा ।
कोरबा जिले के ग्राम पंचायत तरदा में पुलिसिया रौब और उरगा थाने की मनमानी ने नाबालिग बच्चों और उनके परिवारों का जीना मुश्किल कर दिया है। जानकारी के अनुसार, उरगा थाना पुलिस द्वारा कई बार आधी रात को गांव से नाबालिग लड़कों को उठाकर थाने ले जाया जा रहा है, और उन्हें पूरी रात हथकड़ी लगाकर बैठाए रखने की घटनाएँ गंभीर चिंता का विषय बन चुकी हैं।
ग्रामीणों का आरोप है कि पुलिस बिना किसी ठोस प्रमाण या वारंट के केवल संदेह के आधार पर बच्चों को चोर करार देते हुए उठा ले जाती है। जब परिजनों ने थाना प्रभारी से संपर्क साधना चाहा, तो उन्होंने मोबाइल रिसीव तक नहीं किया। यह व्यवहार न केवल अमानवीय है, बल्कि कानून के विरुद्ध भी है, क्योंकि किसी भी नाबालिग को इस प्रकार रात में हिरासत में रखना, हथकड़ी लगाना और अभिभावक की अनुपस्थिति में पूछताछ करना कानूनन अपराध है।
ग्राम तरदा के कई परिवारों ने बताया कि पुलिस आधी रात को बच्चों को घर से उठाकर थाने ले जाती है, जिससे पूरे गांव में दहशत का माहौल बन गया है। माता–पिता जब थाने पहुँचकर बच्चों की स्थिति जानना चाहते हैं, तो उन्हें “जांच के लिए लाया है” कहकर टाल दिया जाता है। कई बच्चों को भूखे-प्यासे पूरी रात बैठाए रखने की शिकायतें भी सामने आई हैं।
बच्चों के अधिकारों का खुला उल्लंघन
भारत में नाबालिगों के साथ पुलिस कार्रवाई जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत होती है, जिसमें साफ निर्देश है कि—
नाबालिग को हथकड़ी नहीं लगाई जा सकती
रात में बिना अभिभावकों की मौजूदगी के पूछताछ नहीं हो सकती
किसी भी स्थिति में उन्हें अपराधियों की तरह व्यवहार नहीं किया जा सकता
इन सभी प्रावधानों को उरगा थाना पुलिस द्वारा लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है। यह बच्चों के मानसिक, सामाजिक और शैक्षणिक भविष्य को गंभीर रूप से प्रभावित करने वाला कृत्य है।
गुनाहगारों पर कार्रवाई क्यों नहीं?
ग्रामीणों का कहना है कि असली गुनाहगारों और चोरी की घटनाओं पर पुलिस कार्रवाई करने में पसीना निकल जाता है, पर मासूम बच्चों पर रौब दिखाने में उरगा थाना पुलिस पीछे नहीं है। यह रवैया पुलिस विभाग की छवि को धूमिल कर रहा है और लोगों में अविश्वास बढ़ा रहा है।
प्रशासन की चुप्पी सवाल खड़े करती है
सबसे बड़ा सवाल है कि इतनी गंभीर शिकायतों के बावजूद जिला प्रशासन, बाल संरक्षण इकाई और पुलिस अधीक्षक कार्यालय चुप क्यों है? क्या नाबालिग बच्चों के अधिकारों की रक्षा करने वाले एजेंसियों की जिम्मेदारी सिर्फ कागजों तक सीमित है?
निष्पक्ष जांच और कठोर कार्रवाई की मांग
ग्राम पंचायत तरदा के लोगों ने शासन–प्रशासन से मांग की है कि—
उरगा थाना प्रभारी एवं संबंधित पुलिसकर्मियों के विरुद्ध तत्काल जांच हो
नाबालिगों के अधिकारों के उल्लंघन पर कठोर कार्रवाई की जाए
गांव में अनावश्यक उत्पीड़न बंद किया जाए
बच्चों को मानसिक प्रताड़ना देने वालों को निलंबित कर कानूनन दंडित किया जाए
यह मामला केवल एक गांव का नहीं, बल्कि पूरे जिले में पुलिस–पब्लिक विश्वास की नींव को हिला देने वाला है। यदि ऐसी घटनाओं पर तत्काल रोक और कार्रवाई नहीं हुई, तो नाबालिग बच्चों का भविष्य बर्बाद होने से कोई नहीं रोक सकता।
सरकार और उच्च अधिकारियों को चाहिए कि बच्चों पर अत्याचार करने वाले ऐसे पुलिस अधिकारियों पर उदाहरणात्मक कार्रवाई करें, ताकि भविष्य में कोई भी अधिकारी अपने अधिकारों का दुरुपयोग न करे।

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