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मोबाइल–लैपटॉप की रोशनी से बच्चों की आंखों पर बढ़ता खतरा

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जांजगीर चांपा संवाददाता – राजेन्द्र जयसवाल

अब लापरवाही नहीं, तत्काल जिम्मेदारी निभाएं अभिभावक और शिक्षक

जिला जांजगीर चांपा
चांपा, 15 दिसंबर।
डिजिटल युग ने जहां बच्चों की पढ़ाई और जानकारी तक पहुंच आसान बनाई है, वहीं अत्यधिक मोबाइल, लैपटॉप और टैबलेट के उपयोग ने उनकी आंखों के स्वास्थ्य पर गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। चांपा में हाल ही में आयोजित नेत्ररोग विशेषज्ञों की कार्यशाला और प्रेस वार्ता में जो तथ्य सामने आए, वे हर माता-पिता और शिक्षक को झकझोरने वाले हैं।

नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. मयंक दुबे, डॉ. मनोज राठौर और डॉ. वसुंधरा बंसल ने स्पष्ट चेतावनी दी कि बढ़ता स्क्रीन टाइम किशोरों और बच्चों में आंखों की बीमारियों को खतरनाक स्तर तक पहुंचा रहा है। यदि अभी भी सावधानी नहीं बरती गई, तो आने वाली पीढ़ी कम उम्र में ही चश्मा, आंखों के संक्रमण और गंभीर नेत्र रोगों की शिकार हो सकती है।

स्क्रीन टाइम बना सबसे बड़ा दुश्मन

डॉ. मयंक दुबे के अनुसार मोबाइल, लैपटॉप और टैबलेट की लगातार स्क्रीनिंग से आंखों पर अत्यधिक दबाव पड़ता है, जिसे डिजिटल आई स्ट्रेन कहा जाता है। इससे आंखों में जलन, धुंधलापन, सिरदर्द और गर्दन दर्द जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं।
उन्होंने 20-20-20 नियम अपनाने की सलाह दी — हर 20 मिनट में 20 सेकेंड के लिए 20 फीट दूर देखें।
साथ ही उन्होंने बताया कि स्क्रीन देखने के दौरान पलकें झपकने की दर लगभग 60 प्रतिशत तक कम हो जाती है, जिससे आंखें सूखने लगती हैं।

प्राकृतिक धूप में समय बिताना बच्चों में मायोपिया (निकट दृष्टि दोष) को रोकने का सबसे प्रभावी उपाय बताया गया। धूप में निकलते समय 100 प्रतिशत UV प्रोटेक्शन वाले सनग्लासेस पहनना अनिवार्य बताया गया।

खानपान और पानी भी आंखों के रक्षक

डॉ. मनोज राठौर ने कहा कि आंखों का स्वास्थ्य केवल दवाओं से नहीं, बल्कि सही खानपान से भी जुड़ा है।
उन्होंने पालक, केल, अंडा, ओमेगा-3 युक्त खाद्य पदार्थ (अखरोट, चिया सीड्स, अलसी, फैटी फिश), विटामिन C व E से भरपूर फल-मेवे (संतरा, स्ट्रॉबेरी, बादाम) को दैनिक आहार में शामिल करने पर जोर दिया।
साथ ही पर्याप्त मात्रा में पानी पीना आंखों को स्वस्थ रखने के लिए जरूरी बताया।

लापरवाही से बढ़ रहे संक्रमण

डॉ. वसुंधरा बंसल ने चेताया कि किशोरों में आंखों के संक्रमण तेजी से बढ़ रहे हैं। कॉन्टैक्ट लेंस का उपयोग हमेशा साफ हाथों से करने, आंखों में लालिमा, दर्द, पानी आना जैसे लक्षणों को नजरअंदाज न करने की सलाह दी गई।
उन्होंने बताया कि ग्लूकोमा जैसी गंभीर बीमारियां बिना लक्षण के शुरू होती हैं, इसलिए हर वर्ष पूर्ण नेत्र जांच अत्यंत आवश्यक है।

क्रिकेट और फुटबॉल जैसे खेलों में तेज गेंद से आंखों को नुकसान पहुंच सकता है, इसलिए किशोरों को स्पोर्ट्स प्रोटेक्टिव आईवियर पहनने की सलाह दी गई।

माता-पिता और शिक्षकों के लिए कड़े संदेश

डॉक्टरों ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि 14 वर्ष से पहले बच्चों को व्यक्तिगत मोबाइल न दिया जाए, टीवी देखने की सीमा एक घंटे से अधिक न हो और सोशल मीडिया का उपयोग 16 वर्ष के बाद ही करने दिया जाए।
शिक्षकों से अपील की गई कि वे छोटे बच्चों को डिजिटल माध्यम से प्रोजेक्ट या होमवर्क न दें, ताकि कम उम्र में मोबाइल की लत न विकसित हो।

अब जागने का समय

यह केवल डॉक्टरों की सलाह नहीं, बल्कि एक सामाजिक चेतावनी है। बच्चों की आंखें अनमोल हैं और उनकी सुरक्षा हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।
यदि आज अभिभावक और शिक्षक सजग नहीं हुए, तो कल यही बच्चे आंखों की गंभीर बीमारियों के साथ जीवन जीने को मजबूर होंगे।

अब समय आ गया है कि हर पिता-माता और शिक्षक तत्काल संज्ञान लें, बच्चों के स्क्रीन टाइम पर नियंत्रण करें और उनकी आंखों को सुरक्षित भविष्य दें।

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