रायपुर संवाददाता – रघुराज
रायपुर, नए साल की रात—नए साल की खुशियों के बीच देशभर के शहरों में जो दृश्य देखने को मिले, उन्होंने समाज के विवेक और जिम्मेदारी पर गहरे सवाल खड़े कर दिए। दिल्ली, मुंबई, पुणे, बेंगलुरु से लेकर रायपुर तक, सड़कों पर डगमगाती युवतियाँ, नशे में बेसुध महिलाएँ और उनके चारों ओर भीड़ व कैमरे का तमाशा… यह महज़ नए साल की पार्टियों की तस्वीरें नहीं थीं, बल्कि सामाजिक चेतना के पतन का प्रतीक बन चुका दृश्य था।

रायपुर के श्रीनगर चौक, खमतराई इलाके में भी ऐसे ही नज़ारे देखने को मिले। स्थानीय ‘स्काई कैफ़े’ जैसे स्थानों पर खुलेआम नियमों की अनदेखी और देर रात तक मादक पदार्थों का सेवन आम बात हो चुकी है। पहले जो दृश्य बड़े शहरों तक सीमित थे, अब गली-मोहल्लों में भी फैलते जा रहे हैं। सवाल यह है कि क्या यह आधुनिकता का संकेत है या आत्मविनाश का?
विज्ञान यह साबित कर चुका है कि शराब का असर महिलाओं पर पुरुषों की तुलना में अधिक तेज़ और गहरा होता है। यह कोई सामाजिक पूर्वाग्रह नहीं, बल्कि जैविक सच्चाई है। समान मात्रा में शराब लेने पर महिला के शरीर, हार्मोन और मस्तिष्क पर प्रभाव अधिक पड़ता है—और यही कारण है कि नशे की हालत में अक्सर वे स्वयं को जोखिम में डाल देती हैं।
लेकिन बात सिर्फ शराब भर की नहीं है। यह प्रश्न हमारी सामाजिक जिम्मेदारी और व्यवस्था की भी परीक्षा है। राजधानी समेत कई शहरों में 1 जनवरी की रात के वीडियो में दिखा कि कोई युवती होटल के अंदर नशे में झूम रही थी, कोई सड़क पर बेहोश पड़ी थी—और उसके पास उसका रोता हुआ बच्चा। पुलिसकर्मी वहीं खड़े थे, पर किसी ने उसे छूने की हिम्मत नहीं की, क्योंकि आशंका थी कि मदद भी “गलत मंशा” समझी जा सकती है। यह स्थिति न केवल भयावह है, बल्कि समाज की संवेदनहीनता का संकेत भी है।
अक्सर “हमारी लाइफ, हमारी मर्जी” जैसे नारे स्वतंत्रता के नाम पर दिए जाते हैं, लेकिन जब यही आज़ादी आत्मविनाश का कारण बन जाए, तो उसका पुनर्मूल्यांकन ज़रूरी हो जाता है। सच्चा नारी सशक्तिकरण वह नहीं जो शरीर या समाज को खतरे में डाले, बल्कि वह है जो खुद को और अगली पीढ़ी को सुरक्षित, सजग और समर्थ बनाए।
हर अभिभावक, हर भाई और हर समाज का सदस्य यदि प्रेम और जिम्मेदारी के भाव से अपनी बहू, बहन और बेटियों को समझाए, तो यह अपमान नहीं बल्कि सच्ची चिंता होगी। परिवार का संरक्षण स्वतंत्रता का विरोध नहीं, बल्कि उसकी रक्षा है।
आज आवश्यकता है—उग्रता की नहीं, संयम की; दिखावटी आधुनिकता की नहीं, वास्तविक संवेदनशीलता की।
क्योंकि सच्ची आज़ादी वही है जो हमें मजबूत बनाए—टूटा हुआ नहीं।









