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कोतवाली जांजगीर थाना : कानून का राज या वर्दी की दहशत?

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जांजगीर-चांपा संवाददाता – राजेन्द्र जायसवाल

जिला जांजगीर-चांपा।
कोतवाली थाना जांजगीर इन दिनों अपराध नियंत्रण के लिए नहीं, बल्कि कथित पुलिसिया मनमानी के कारण चर्चा में है। 31 दिसंबर 2025 को पदभार ग्रहण करने के बाद से ही कोतवाली थाना प्रभारी जय प्रकाश गुप्ता को लेकर ऐसे सवाल उठ रहे हैं, जिन्हें अनदेखा करना अब प्रशासन के लिए भी आसान नहीं रहा।
यह आरोप केवल फाइलों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि गरीब तबके की आंखों में डर, महिलाओं की चुप्पी और बच्चों के चेहरे पर भय बनकर सामने आ रहे हैं।

कोतवाली थाना जांजगीर बना ‘दबाव केंद्र’?
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि कोतवाली थाना अब न्याय का केंद्र नहीं, बल्कि दबाव बनाने का अड्डा बनता जा रहा है। जब चाहे किसी को उठाकर थाने ले आना, मनमानी मांगें रखना, और पूरी न होने पर कानूनी धाराओं की तलवार लटका देना—ये आरोप बेहद गंभीर हैं।
यदि कानून का इस्तेमाल डर पैदा करने के लिए होने लगे, तो यह केवल सत्ता का दुरुपयोग नहीं, बल्कि संविधान पर सीधा प्रहार है।

गरीब ही क्यों निशाने पर?
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि आरोपों के अनुसार गरीब, कमजोर और आवाज उठाने में असमर्थ लोग ही सबसे ज्यादा निशाने पर हैं। जिनके पास न पैसा है, न पहुंच, न सिफारिश—उन्हीं को अपराधी बना देना सबसे आसान रास्ता बन गया है।

क्या यही है पुलिस सुधारों का सच?
क्या वर्दी अब न्याय की नहीं, बल्कि भय की पहचान बनती जा रही है?
महिला और बच्चों पर कार्रवाई – संवेदनशीलता का अभाव
आरोप यह भी हैं कि कथित कार्रवाइयों में महिलाओं और नाबालिग बच्चों तक को आरोपी बनाया गया। यदि यह सच है, तो यह न केवल पुलिस मैनुअल, बल्कि मानवाधिकारों का भी घोर उल्लंघन है।
यह सवाल उठना लाज़मी है—क्या कानून इतना कमजोर है कि उसे बच्चों और गरीब महिलाओं पर आजमाया जा रहा है?

अपने वाहीवाही के लिए धाराएं?
कहा जा रहा है कि अपनी कार्यकुशलता दिखाने और आंकड़े चमकाने के लिए मामलों में कठोर धाराएं जोड़ी जा रही हैं। यदि पुलिस अपनी पीठ खुद थपथपाने के लिए कानून का सहारा लेने लगे, तो यह न्याय व्यवस्था के लिए सबसे खतरनाक संकेत है।

जिला जांजगीर चांपा पुलिस अधीक्षक की परीक्षा की घड़ी
अब यह मामला थाना स्तर से ऊपर उठ चुका है। पुलिस अधीक्षक जांजगीर-चांपा के लिए यह केवल एक अधिकारी पर लगे आरोपों की जांच नहीं, बल्कि पूरे कोतवाली जांजगीर थाना की विश्वसनीयता बचाने की परीक्षा है।
यदि आरोप निराधार हैं, तो पारदर्शी जांच से सच सामने आए।
और यदि आरोपों में सच्चाई है, तो तत्काल प्रभाव से लाइन अटैच कर निष्पक्ष जांच ही एकमात्र रास्ता है।

खामोशी भी अपराध होती है
प्रशासन की अब तक की चुप्पी खुद में कई सवाल खड़े करती है। इतिहास गवाह है—जब-जब सत्ता ने गलत को अनदेखा किया, तब-तब जनता का भरोसा टूटा है।
यह समय फाइलें दबाने का नहीं, सच सामने लाने का है।

जनता अब डर नहीं, जवाब चाहती है
कोतवाली थाना चांपा की कार्यप्रणाली पर उठे सवालों का जवाब देना अब अनिवार्य हो चुका है।
कानून का राज वर्दी से चलता है, वर्दी का राज कानून से नहीं।
अब देखना यह है कि प्रशासन न्याय के साथ खड़ा होता है या खामोशी के साथ।

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