जीतेन्द्र बिरंवार/नारायणपुर –
बस्तर में नक्सलवाद के बाद अब नया सामाजिक संकट उभरने लगा है. कभी अबूझमाड़ नक्सलियों का अभेद्य इलाका माना जाता था. यहां बाहरी लोगों की एंट्री लगभग नामुमकिन थी और सरकारी योजनाएं भी नहीं पहुंच पाती थीं. किसी तरह इस समस्या को खत्म करने की डेडलाइन तय कर काम किया गया लेकिन उससे पहले ही धर्मांतरण जैसे मुद्दे ने इसे घेर लिया. धर्मांतरण के चलते ही शांत माने जाने वाले इलाके में भी विवाद और माहौल तनावपूर्ण बनने लगे हैं. देखिए ये खास रिपोर्ट-
इलाज के बहाने शुरू हुआ चर्च से जुड़ाव
आदिवासी समाज अपनी परंपराओं, पेन-पुरखा व्यवस्था, देवी-देवताओं की पूजा और प्रकृति से जुड़े जीवन के साथ शांतिपूर्वक रहता था. करीब पांच से सात साल पहले प्रशासन और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के बीच इलाज और मानसिक सहारे के नाम पर ईसाई मिशनरियों की प्रार्थना सभाएं शुरू हुईं. कुछ ग्रामीण बीमारी और मुश्किल समय में चर्च से जुड़े. कहीं किसी को राहत मिलने लगी तो कहीं झांसा देने के भी आरोप लगे लेकिन कई परिवार धीरे-धीरे ईसाई धर्म अपनाने लगे. रविवार की प्रार्थना, चर्च के नियम और आदिवासी परंपराओं से दूरी उनकी दिनचर्या का हिस्सा बनती चली गई.

अबूझमाड़ में धर्मांतरण का विवाद
आदिवासी परंपराओं से दूरी बनी टकराव की वजह
समय के साथ चर्च से जुड़े कुछ लोगों ने गांव की सामूहिक परंपराओं, त्योहारों और देवी-देवताओं की पूजा का विरोध शुरू कर दिया. इससे गांव की एकता कमजोर होने लगी. नक्सल प्रभाव के कारण यह विवाद खुलकर सामने नहीं आया, लेकिन जैसे ही नक्सलवाद कमजोर पड़ा और मोबाइल-इंटरनेट पहुंचा, अंदरूनी तनाव बढ़ने लगा.
धर्मांतरण को लेकर इकनार गांव में 2 गुटों में विवाद
बड़ेतेवड़ा विवाद के बाद बढ़ी चिंता कांकेर जिले के बड़ेतेवड़ा में हुए धर्मांतरण विवाद के बाद यह मुद्दा और गंभीर हो गया. इसी कड़ी में 21 जनवरी को नारायणपुर जिले के ओरछा थाना क्षेत्र के ग्राम पंचायत कोडोली के आश्रित गांव इकनार की घटना सामने आई. सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में दो घरों की छत हटाई गई और एक ग्रामीण घायल अवस्था में अस्पताल में भर्ती नजर आया. घायल ग्रामीण मानकू कुमेटी ने आरोप लगाया कि ईसाई धर्म अपनाने के कारण उसके परिवार पर हमला किया गया.
विवाद के बाद थाने तक पहुंची बात, पुलिस ने समझाइश देकर वापस भेजा
पीड़ित का आरोप: धर्म बदलने का दबाव और मारपीट मानकू कुमेटी ने बताया कि पांच साल पहले उसकी मां गंभीर बीमारी से पीड़ित थीं. इलाज न मिलने पर वह चर्च गया, जहां उसे मानसिक संबल मिला और मां की हालत सुधरी. इसके बाद उसने ईसाई धर्म अपनाया. मानकू का आरोप है कि 21 जनवरी की सुबह गांव के लोगों ने उस पर धर्म छोड़ने का दबाव बनाया. इंकार करने पर मारपीट की गई, घर की छत तोड़ी गई और सामान बाहर फेंक दिया गया.
गांव वालों का पक्ष: परंपराओं को बचाना जरूरी
जब मीडिया टीम गांव पहुंची तो ग्रामीणों ने आरोपों को गलत बताया. उनका कहना है कि संबंधित परिवार पिछले पांच साल से गांव की परंपराओं, त्योहारों और सामाजिक नियमों से खुद को अलग रखे हुए थे. ग्रामीणों का दावा है कि छतें तोड़ी नहीं गईं, बल्कि उतारकर नीचे रखी गईं ताकि सामाजिक दबाव बनाया जा सके. दस्तावेज जलाने के आरोप को भी उन्होंने खारिज किया.
धर्मांतरण के चलते विवाद हुआ और एक परिवार की छत उतार दी गई
गांव में वही रह सकता है जो आदिवासी संस्कृति, व्यवस्था और सामूहिक नियमों का पालन करे. अगर धर्मांतरण यूं ही बढ़ता रहा तो आने वाली पीढ़ियों के लिए आदिवासी पहचान खतरे में पड़ जाएगी.- ग्रामीण
पुलिस की मध्यस्थता, गांव में तनावपूर्ण शांति पुलिस ने दोनों पक्षों को थाने बुलाकर समझाइश की. फिलहाल पीड़ित परिवार का इलाज चल रहा है और गांव में शांति तो है लेकिन तनावपूर्ण हालात भी हैं.
इस मामले में ग्राम इकनार के ग्रामीणों को थाने में बुलाया गया था दोनों पक्षों को बैठकर आपसी सामंजस्य के साथ गांव में रहने की समझाइश दी गई है जिसपर दोनों ही पक्ष ने हामी जताई है. फिलहाल इसे लेकर कोई भी पक्ष ने FIR दर्ज नहीं कराई है, आगे हम जरूरी कानूनी कार्रवाई कर रहे हैं जिससे क्षेत्र में शांति बनी रहे. – धर्माराम तिर्की, ओरछा थाना प्रभारी
अबूझमाड़ में नक्सल प्रभाव घटते ही धर्मांतरण नाम का सामाजिक संकट उभरा
अबूझमाड़ के लिए नया संकट फिलहाल नक्सलवाद कमजोर होने के बाद अबूझमाड़ में शांति की उम्मीद जगी थी, लेकिन धर्मांतरण से उपजा यह सामाजिक टकराव एक नई चुनौती बनकर सामने आया है. यह मामला सिर्फ एक गांव या दो परिवारों का नहीं, बल्कि आदिवासी पहचान, संस्कृति और अस्तित्व से जुड़ा बड़ा सवाल बनता जा रहा है. अगर समय रहते संवाद, संवेदनशील प्रशासनिक कदम और सांस्कृतिक समझ के साथ समाधान नहीं निकाला गया, तो यह विवाद पूरे अबूझमाड़ को प्रभावित कर सकता है.









