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8 किमी पैदल चलकर कलेक्टर पहुंचे लावा गांव, विकास की हकीकत से रूबरू हुआ सिस्टम

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हारून रशीद/दंतेवाड़ा।
गुरुवार को दंतेवाड़ा कलेक्टर देवेश कुमार ध्रुव का लावा (लोहा) गांव तक 8 किलोमीटर पैदल पहुंचना महज़ एक प्रशासनिक दौरा नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर सवाल था जो 21वीं सदी में भी एक पूरे गांव तक बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुंचा सकी।किरंदुल–बैलाडीला आयरन ओर माइंस (NMDC) से महज 8 किलोमीटर दूर बसे इस गांव में केवल 12–15 परिवार और लगभग 60–70 की आबादी है, लेकिन समस्या जनसंख्या की नहीं, उपेक्षा की है।

खनन से अरबों का राजस्व, गांव अंधेरे में

बैलाडीला क्षेत्र से हर साल 50 मिलियन टन से अधिक लौह अयस्क का उत्पादन होता है। अनुमान है कि वर्ष 2024–25 में इससे छत्तीसगढ़ सरकार को ₹2000 करोड़ से अधिक की आय होगी। देश की सड़कें, पुल, रेल पटरियां और इमारतें इसी खनिज से बनती हैं, लेकिन उसी खनन क्षेत्र की छाया में बसे लावा गांव में आज भी पक्की सड़क, बिजली, पेयजल, स्कूल और स्वास्थ्य सुविधाएं नदारद हैं।सबसे बड़ा सवाल यह है कि जहां खनन कंपनियों की भारी मशीनें पहाड़ चीरकर पहुंच जाती हैं, वहां प्रशासन की सड़क आज तक क्यों नहीं पहुंच पाई?

ग्रामीणों से सीधा संवाद, समस्याओं का खुलासा

कलेक्टर देवेश कुमार ध्रुव (2018 बैच IAS) गांव पहुंचकर ग्रामीणों के बीच बैठे और उनकी समस्याएं सुनीं। ग्रामीणों ने सड़क, पानी, बिजली, स्कूल, आंगनबाड़ी और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी की बात खुलकर रखी।कलेक्टर ने मौके पर ही कई निर्देश दिए—

  • नरेगा से कुआं निर्माण
  • सोलर ऊर्जा आधारित विद्युतीकरण
  • स्वास्थ्य जांच शिविर
  • महिलाओं और बच्चों के पोषण पर विशेष ध्यान
  • प्री-फैब्रिकेटेड स्कूल मॉडल
  • आंगनबाड़ी व सामुदायिक भवन निर्माण

साथ ही आधार सुधार, राशन वितरण और अन्य शासकीय सेवाएं गांव स्तर पर ही उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया गया।

दौरा सराहनीय, लेकिन सवाल बरकरार

कलेक्टर का पैदल पहुंचना संवेदनशीलता का संकेत जरूर है, लेकिन यह कई सवाल भी छोड़ गया—
यदि अधिकारी पैदल गांव तक पहुंच सकता है, तो सड़क क्यों नहीं बन सकी?
क्या घोषणाएं इस बार ज़मीन पर उतरेंगी या फाइलों तक ही सीमित रहेंगी?ग्रामीणों ने बताया कि पहले भी कई बार योजनाओं की घोषणा हुई, लेकिन धरातल पर बदलाव नहीं दिखा।

नक्सल प्रभाव का तर्क कितना सही?

दुर्गमता और नक्सल प्रभाव का हवाला देकर अक्सर विकास में देरी को जायज ठहराया जाता है। लेकिन जहां खनन निर्बाध चल रहा है, सुरक्षा तंत्र मौजूद है और करोड़ों का राजस्व निकल रहा है, वहां सामाजिक विकास असुरक्षित कैसे हो सकता है?

दौरे से आगे बढ़कर बदलाव की जरूरत

यह दौरा लावा गांव का निरीक्षण नहीं, बल्कि व्यवस्था का आईना था। इसने साफ कर दिया कि पहुंचना असंभव नहीं है, संसाधनों की कमी नहीं है—कमी है तो सिर्फ निरंतर इच्छाशक्ति की।अब सवाल यह नहीं कि कलेक्टर कितनी दूर पैदल चले, बल्कि यह है कि अगली बार गांव तक पक्की सड़क पहुंचेगी या नहीं, रात में एंबुलेंस आ सकेगी या नहीं, बच्चों को स्कूल और घरों को बिजली मिलेगी या नहीं।कलेक्टर ने शुरुआत कर दी है।
अब जिम्मेदारी सिस्टम की है—
कि वह गांव में ठहरे या सिर्फ गुजर जाए।क्योंकि गांव को दौरे नहीं, बदलाव का दौर चाहिए।

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