बस्तर संवाददाता – अर्जुन झा
राष्ट्रपति ने आदिवासी बालिका शिक्षा के प्रसार का किया आह्वान
राष्ट्रपति श्रीमती मुर्मू ने किया संभागीय बस्तर पंडुम का शुभारंभ
जगदलपुर। राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि आदिवासियों की संस्कृति में छत्तीसगढ़ की आत्मा बसती है। उन्होंने बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी के जयघोष के साथ अपने उद्बोधन में कहा कि भारत में छत्तीसगढ़ ऐसा राज्य है, जहां सरकार अपनी संस्कृति, जनजातीय परंपराओं और प्राचीन विरासतों को संरक्षित करने के लिए बस्तर पंडुम जैसे आयोजन कर रही है, इसमें आदिवासियों की गौरवशाली संस्कृति प्रतिबिंबित होती है।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू आज जगदलपुर में शनिवार को संभाग स्तरीय बस्तर पंडुम-2026 का शुभारंभ करते हुए उक्त बातें कही। श्रीमती मुर्मू ने जगदलपुर के ऐतिहासिक लालबाग मैदान में आयोजित समारोह में आदिवासी कलाकारों और विशाल जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा कि प्रदेश की विष्णुदेव सरकार छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के लिए समर्पित है। विभिन्न योजनाओं के जरिए जनजातीय उत्थान के लिए लगातार बेहतर प्रयास कर रही है। पीएम जनमन, प्रधानमंत्री जनजातीय गौरव उत्कर्ष अभियान तथा नियद नेल्लानार जैसी योजनाओं के माध्यम से लोगों को विकास से जोड़ रही है। उन्होंने बस्तर क्षेत्र में बालिका शिक्षा पर विशेष जोर देते हुए कहा कि आदिवासी बालिकाओं की शिक्षा से जोड़ने के लिए शासन के साथ-साथ समाज और माता-पिता को भी आगे आना चाहिए। राष्ट्रपति ने बस्तर की समृद्ध आदिवासी संस्कृति और गौरवशाली परंपराओं की सराहना करते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ की प्राचीन परंपराओं की जड़ें आज भी मजबूत हैं और बस्तर पंडुम जनजातीय समुदाय की पहचान, गौरव और उनकी समृद्ध परंपरा को प्रोत्साहित करने वाला एक महत्वपूर्ण मंच है।
राष्ट्रपति ने कहा कि हिंसा का रास्ता छोड़ माओवादी मुख्यधारा में शामिल हो रहे हैं तथा लोकतंत्र के प्रति उनकी आस्था बढ़ी है। वर्षों से बंद विद्यालय खुल रहे हैं, दुर्गम वनांचल में सड़कों, पुल-पुलियों का निर्माण हो रहा है और ग्रामीण विकास से जुड़ रहे हैं। बस्तर की सुंदरता और यहां की संस्कृति हमेशा से लोगों के आकर्षण का केंद्र रही है लेकिन दुर्भाग्य से चार दशकों तक यह क्षेत्र माओवाद से ग्रस्त रहा। इस कारण यहां के निवासियों ने अनेक कष्ट झेले। भारत सरकार की माओवादी आतंक पर निर्णायक कार्रवाई के परिणामस्वरूप वर्षों से व्याप्त असुरक्षा, भय और अविश्वास का वातावरण अब समाप्त हो रहा है। माओवाद से जुड़े लोग हिंसा का रास्ता छोड़ रहे हैं जिससे नागरिकों के जीवन में शांति लौट रही है। राष्ट्रपति ने आगे कहा कि प्रदेश सरकार के प्रयास और इस क्षेत्र के लोगों के सहयोग के बल पर आज बस्तर में विकास का नया सूर्योदय हो रहा है। गांव- गांव में बिजली, सड़क, पानी की सुविधा उपलब्ध हो रही है। वर्षों से बंद विद्यालय फिर से खुल रहे हैं और बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं। यह बहुत ही सुखद तस्वीर है जो सभी देशवासियों में खुशी का संचार कर रही है। उन्होंने उपस्थित लोगों से अपनी संस्कृति और पारंपरिक विरासतों को संजोने और सहेजने की अपील करते हुए बस्तर की जनजातीय परंपराओं को राष्ट्रीय और वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने की बात कही।

कुछ इस तरह था राष्ट्रपति का भाषण
राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू ने हिंदी में संबोधन दिया और शुरुआत जय जोहार से की। उनके भाषण के कुछ अंश-
बस्तर की समृद्ध जनजातीय संस्कृति और विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन से जुड़े ‘बस्तर पंडुम’ महोत्सव में आप सबके बीच उपस्थित होकर मुझे हार्दिक प्रसन्नता हो रही है। मां दंतेश्वरी के इस पुण्य क्षेत्र में आने का अवसर मिलना मैं अपना सौभाग्य मानती हूं। मैं जब भी छत्तीसगढ़ आती हूं, मुझे लगता है कि मैं अपने घर आई हूं। यहां के लोगों से जो अपनत्व और स्नेह मुझे मिलता है, वह मेरे लिए अनमोल है। यह ऐसे कई नायकों की धरती है, जिन्होंने भारत भूमि की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। मैं ऐसे सभी सपूतों की स्मृति में सादर नमन करती हूं। बस्तर की सुंदरता को देखकर लगता है कि मां दंतेश्वरी ने स्वयं इसे अपने हाथों से सजाया है। मौसम बदलने के साथ प्रकृति मानो करवट लेती है और यहां के लोग उत्सव मनाते हैं। जब इस ऊर्वर धरती में किसान बीज छिड़कते हैं, तब यह पंडुम होता है। जब आम का मौसम आता है, तब यह पंडुम होता है। बस्तर के लोग जीवन को उत्सव के रूप में जीते हैं। जीवन जीने का यह तरीका सभी देशवासी बस्तर के निवासियों से सीख सकते हैं। पिछले वर्ष आयोजित बस्तर पंडुम के माध्यम से बस्तर की जनजातीय संस्कृति की झलक देश भर के लोगों ने देखी थी। मुझे बताया गया है इस वर्ष के पंडुम में पचास हजार से अधिक लोगों द्वारा जनजातीय संस्कृति तथा जीवन-शैली से जुड़े अनेक प्रदर्शन किए जाएंगे। बस्तर की जनजातीय संस्कृति से देशवासियों को अवगत कराने के इस महत्वपूर्ण प्रयास के लिए मैं छत्तीसगढ़ सरकार की सराहना करती हूं। बस्तर क्षेत्र में आकर्षक पर्यटन स्थल बनने की प्रचुर क्षमता है। यहां के उत्साही लोग और उनकी प्राचीन संस्कृति, प्राकृतिक सुंदरता, जलप्रपात और गुफाएं पर्यटकों को आकर्षित करने में सक्षम हैं। बेहतर सुविधाएं उपलब्ध होने से पर्यटक यहां आना जरूर पसंद करेंगे। आजकल दुनिया भर में होम स्टे एक नये प्रकार के पर्यटन के रूप में लोकप्रिय हो रहा है। मुझे बताया गया है कि छत्तीसगढ़ सरकार इस दिशा में अनुकूल कदम उठा रही है। बस्तर की सुंदरता और यहां की संस्कृति हमेशा से लोगों के आकर्षण का केंद्र रही है लेकिन दुर्भाग्य से चार दशकों तक यह क्षेत्र माओवाद से ग्रस्त रहा। इस कारण यहां के निवासियों ने अनेक कष्ट झेले। सबसे ज्यादा नुकसान यहां के युवाओं, आदिवासियों और दलित भाई-बहनों को हुआ। भारत सरकार की माओवादी आतंक पर निर्णायक कार्रवाई के परिणाम स्वरूप वर्षों से व्याप्त असुरक्षा, भय और अविश्वास का वातावरण अब समाप्त हो रहा है। माओवाद से जुड़े लोग हिंसा का रास्ता छोड़ रहे हैं जिससे नागरिकों के जीवन में शांति लौट रही है। बड़ी संख्या में माओवाद से प्रभावित रहे लोगों ने आत्मसमर्पण किया है। सरकार यह सुनिश्चित कर रही है कि जो लोग हथियार छोड़कर मुख्यधारा में लौटे हैं, वो सामान्य जीवन जी सकें। उनके लिए अनेक विकास और कल्याणकारी योजनाएं चलाई जा रही हैं। राज्य सरकार की ‘नियद नेल्लानार योजना’ ग्रामीणों के सशक्तीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
सरकार के प्रयास और इस क्षेत्र के लोगों के सहयोग के बल पर आज बस्तर में विकास का नया सूर्योदय हो रहा है। गांव-गांव में बिजली, सड़क, पानी की सुविधा उपलब्ध हो रही है। वर्षों से बंद विद्यालय फिर से खुल रहे हैं और बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं। यह बहुत ही सुखद तस्वीर है जो सभी देशवासियों में खुशी का संचार कर रहा है।
मैं हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौटे लोगों से मेरा उनसे अनुरोध है कि देश के संविधान और लोकतंत्र में वे पूरी आस्था रखें। बस आपको इस व्यवस्था में विश्वास रखते हुए मेहनत व लगन से आगे बढ़ना है। यह लोकतंत्र की ताकत ही है कि ओड़िशा के एक छोटे से गांव की यह बेटी, भारत की राष्ट्रपति के रूप में आपको संबोधित कर रही है। राष्ट्रपति ने कहा कि छत्तीसगढ़ की प्राचीन परंपराओं की गहरी जड़ें आज भी जीवंत बनी हुई हैं। मां दंतेश्वरी को समर्पित बस्तर दशहरा जनजातीय संस्कृति और भाईचारे का अनूठा उदाहरण है। हमें अपने गौरवशाली इतिहास से प्रेरणा लेते हुए स्वर्णिम भविष्य का निर्माण करना है। विकास का वही मॉडल सफल है, जो विरासत को संजोते हुए आगे बढ़ाएं। राष्ट्रपति ने अपने भाषण का समापन जय जय छत्तीसगढ़ के जयकारे के साथ किया
लोक संस्कृति का उत्सव: डेका
राज्यपाल रमेन डेका ने कहा कि बस्तर पंडुम कोई साधारण मेला नहीं है, यह हमारी लोक संस्कृति का उत्सव है। यहां के लोकनृत्य, लोकगीत, पारंपरिक पहनावा, आभूषण, ढोल-नगाड़े और हमारे पारंपरिक व्यंजन सब मिलकर बस्तर की सुंदर तस्वीर दुनिया को दिखाती है। गौर नृत्य, परघौनी नृत्य और धुरवा, मुरिया, लेजा जैसे नृत्य, बस्तर की सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक हैं। उन्होंने कहा कि इस तरह का महोत्सव हमारी आदिवासी संस्कृति और परंपराओं को नई पीढ़ी से जोड़ने का सशक्त माध्यम बनता है। राज्यपाल ने कहा कि बस्तर की पहचान उसकी जनजातीय संस्कृति और परंपरा से है। यहां गोंड, मुरिया, माड़िया, हल्बा और भतरा, परजा समाज के लोग पीढ़ियों से अपनी मूल परंपराओं को सहेजते आए हैं। यहां के लोग जल, जंगल, जमीन और प्रकृति के तालमेल के साथ रहते हैं, यही बस्तर की सबसे बड़ी ताकत है। बस्तर पंडुम में गांव-गांव के कलाकार यहां आकर अपनी कला दिखाएंगे, जिससे न केवल उनकी पहचान बढ़ेगी, बल्कि उन्हें सम्मान और आजीविका का साधन भी प्राप्त होगा।
ढोकरा कला छत्तीसगढ़ की शान
श्री डेका ने कहा कि ढोकरा कला छत्तीसगढ़ की शान है। बस्तर में बनने वाली ढोकरा शिल्प की मूर्तियां देश-विदेश में पसंद की जाती हैं। छत्तीसगढ़ की इस पारंपरिक और विशिष्ट शिल्प कला की मांग देश और विदेश में बढ़ रही है। यह हमारे जनजातीय शिल्पकारों की संस्कृति, मेहनत और कौशल का प्रमाण है। उन्होंने कहा कि बस्तर की संस्कृति केवल छत्तीसगढ़ की ही नहीं, बल्कि पूरे भारत की लोक परंपराओं और विविधताओं का प्रतीक है।

समृद्ध परंपराओं की धरती है बस्तर: साय
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने माँ दंतेश्वरी को नमन करते हुए कहा कि राष्ट्रपति श्रीमती मुर्मू का बस्तर पंडुम में आना औपचारिक उपस्थिति नहीं, बल्कि बस्तर के लिए आशीर्वाद, जनजातीय समाज के लिए सम्मान और माताओं-बहनों के लिए अपनत्व है। उन्होंने कहा कि बस्तर पंडुम केवल एक आयोजन नहीं है, बल्कि यहां के जनजातीय समाज के जीवन, उनकी आस्था, बोली-भाषा, नृत्य-गीत, वेशभूषा, खान-पान और उनके जीवन-दर्शन का जीवंत प्रतिबिंब है। मुख्यमंत्री ने कहा कि बस्तर केवल जंगलों की धरती नहीं, बल्कि समृद्ध संस्कृति और परंपराओं की धरती है। श्री साय ने कहा कि इस वर्ष 54 हजार से अधिक कलाकारों ने 12 विधाओं में प्रतियोगिता के लिए पंजीयन कराया है, जो बस्तर की संस्कृति में जीवंतता और समृद्धि का प्रतीक है। मुख्यमंत्री ने कहा कि एक समय था जब बस्तर को नक्सलवाद और हिंसा के लिए जाना जाता था, विकास यहां तक पहुंच नहीं पाता था। लोगों के मन में भय था, भविष्य को लेकर अनिश्चितता थी, लेकिन आज डर की जगह भरोसे ने और हिंसा की जगह विकास ने ले ली है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के दृढ़ संकल्प से 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद के समूल उन्मूलन का लक्ष्य तय किया गया है। मुख्यमंत्री ने कहा आज बस्तर में बदलाव साफ दिखाई देता है। जहां कभी गोलियों की भयावह आवाज़ गूंजती थी, आज स्कूलों की घंटी बजती है। जहां कभी तिरंगा नहीं लहरा पाया, आज वहां राष्ट्रगान की गूंज सुनाई देती है। गणतंत्र दिवस को बस्तर संभाग के अति-संवेदनशील गांवों में पहली बार तिरंगा फहराया गया, यह लोकतंत्र और संविधान की जीत है। मुख्यमंत्री ने कहा कि नियद नेल्ला नार योजना, प्रधानमंत्री जनमन और धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान आदिवासी क्षेत्रों में विकास के लिए मील का पत्थर साबित हो रहे हैं। इन योजनाओं के माध्यम से दुर्गम इलाकों तक सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य और संचार की सुविधाएं पहुंच रही हैं। छत्तीसगढ़ की नई पुनर्वास नीति ने भी बड़ा बदलाव किया गया है, जिसका परिणाम है कि जो लोग कभी बंदूक के रास्ते पर थे, आज वे सम्मान के साथ समाज की मुख्यधारा में लौट रहे हैं। उन्होंने कहा कि हमारा लक्ष्य शांति स्थापित करते हुए बस्तर का समग्र विकास करना है। चिल्कापल्ली, तेमेनार, हांदावाड़ा जैसे गांव वर्षों के अंधेरे से मुक्त होकर आज बिजली की रोशनी से जगमगा रहे हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि बस्तर की पहचान जंगल और पहाड़ के साथ ही यहां के वनोपज हैं। राज्य सरकार ने तेंदूपत्ता संग्रहण दर बढ़ाई है। चरण-पादुका योजना फिर से शुरू की है। वन धन केंद्रों के जरिए वनोपज को उचित मूल्य और बाजार उपलब्ध कराया जा रहा है। श्री साय ने कहा कि जनजातीय समाज को आत्मनिर्भर बनाना और उनकी मेहनत तथा हुनर को वैश्विक पहचान दिलाना ही उनकी सरकार की प्राथमिकता है। उन्होंने कहा कि बस्तर के धुड़मारास गांव को संयुक्त राष्ट्र संघ ने दुनिया के सर्वश्रेष्ठ पर्यटन गांवों में शामिल किया है। चित्रकोट, तीरथगढ़, कांगेर घाटी, कोटमसर गुफाएं, ये केवल पर्यटन स्थल नहीं, ये बस्तर की पहचान हैं।मुख्यमंत्री ने कहा कि बस्तर ओलंपिक और बस्तर पंडुम जैसे आयोजन यह साबित करते हैं कि बस्तर के युवा अब हथियार नहीं, खेल और कला के माध्यम से अपनी पहचान बना रहे हैं। लाखों युवाओं और महिलाओं की भागीदारी इस बदलाव का सबसे मजबूत प्रमाण है।
बस्तर को मिलेगी नई ऊर्जा
मुख्यमंत्री ने बस्तर पंडुम में राष्ट्रपति श्रीमती मुर्मू के शामिल होने पर उनके प्रति आभार जताया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति का बस्तर आना एक ऐतिहासिक क्षण है। उनकी मौजूदगी से हमारे कलाकारों का आत्मविश्वास बढ़ेगा, हमारी बेटियों के सपनों को उड़ान मिलेगी और बस्तर को नई ऊर्जा मिलेगी। उन्होंने कहा कि हम सब मिलकर छत्तीसगढ़ की इस पहचान को और मजबूत करेंगे। हम सब मिलकर बस्तर को शांति, समृद्धि और संस्कृति का एक ऐसा केंद्र बनाएंगे जिस पर छत्तीसगढ़ के साथ पूरे देश को गर्व हो। पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल ने स्वागत भाषण दिया। कोंडागांव बस्तर पंडुम पर आधारित लघु वृत्तचित्र का प्रदर्शन किया गया और कोंडागांव, बास्तानार के कलाकारों ने आकर्षक और मनमोहक प्रस्तुति दी। केन्द्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू, उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा, वन मंत्री केदार कश्यप, जगदलपुर विधायक किरण देव सिंह मंच पर उपस्थित रहे। इस अवसर पर बस्तर सांसद महेश कश्यप, महापौर संजय पांडे, कमिश्नर डोमन सिंह, पुलिस महानिरीक्षक सुंदरराज पी, कलेक्टर आकाश छिकारा और पुलिस अधीक्षक शलभ सिन्हा उपस्थित थे।

अबूझमाड़ का गौरव
बस्तर पंडुम के शुभारंभ समारोह में हजारों स्कूली बच्चों के सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुति के दौरान अबूझमाड़ मल्लखंब एंड स्पोर्ट्स एकेडमी के नन्हे खिलाड़ियों ने राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु के समक्ष मल्लखंब की अद्भुत प्रस्तुति देकर सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। यह पहला अवसर था जब अबूझमाड़ क्षेत्र के बच्चों ने राष्ट्रपति के समक्ष मल्लखंब का जीवंत और साहसिक प्रदर्शन किया।लकड़ी के खंभे पर जब इन नन्हे कलाकारों ने असाधारण संतुलन, फुर्ती और कठिन करतबों का प्रदर्शन किया, तो मैदान में मौजूद दर्शक विस्मय से भर उठे। जोश, अनुशासन और उत्कृष्ट तकनीक से सजी इस प्रस्तुति ने पूरे वातावरण को भावविभोर कर दिया।राष्ट्रपति श्रीमती मुर्मु स्वयं बच्चों की प्रतिभा से अत्यंत प्रभावित हुईं। उन्होंने न केवल उनके साहस, कला और अनुशासन की मुक्तकंठ से प्रशंसा की, बल्कि उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए शुभकामनाएं भी दी। इस ऐतिहासिक उपलब्धि की नींव नारायणपुर जिले के उन दुर्गम और बीहड़ इलाकों में पड़ी है, जहां आज भी बुनियादी सुविधाएं सीमित हैं। कुटूर, करपा और परपा जैसे सुदूर वनांचलों से निकलकर इन बच्चों ने यह सिद्ध कर दिया कि प्रतिभा न तो संसाधनों की मोहताज होती है और न ही भौगोलिक सीमाओं की।
इस संघर्षपूर्ण यात्रा के प्रेरणास्रोत मनोज प्रसाद हैं, जो एकेडमी के संस्थापक होने के साथ-साथ 16वीं बटालियन में आरक्षक के रूप में अपनी सेवाएं भी दे रहे हैं। उनके कुशल नेतृत्व, अनुशासन और सतत मार्गदर्शन में इन बच्चों ने अभावों को पीछे छोड़ते हुए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है।
इन नन्हे मल्लखंब खिलाड़ियों ने ‘इंडियाज गॉट टैलेंट’ का खिताब जीतकर और ‘रोमानियाज गॉट टैलेंट’ में उपविजेता बनकर पहले ही वैश्विक मंच पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। भारत सहित विश्व के विभिन्न देशों में 40 से 50 से अधिक टेलीविजन शो, देशभर में सैकड़ों मंचीय प्रस्तुतियों तथा अनेक प्रतियोगिताओं में स्वर्ण और रजत पदक जीतकर यह टोली निरंतर सफलता के नए आयाम स्थापित कर रही है।

गौर नृत्य ने बिखेरे लोकरंग
इस अवसर पर बास्तानार क्षेत्र के आदिवासी युवाओं द्वारा प्रस्तुत विश्व-प्रसिद्ध गौर नृत्य ने पूरे परिसर को ढोल की थाप और घुंघरुओं की झंकार से गुंजायमान कर दिया। राष्ट्रपति ने इस मनोहारी प्रस्तुति का तन्मयता से अवलोकन करते हुए बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को निकट से महसूस किया।बास्तानार के युवाओं द्वारा प्रस्तुत यह नृत्य केवल एक सांस्कृतिक प्रदर्शन भर नहीं था, बल्कि ‘दंडामी माड़िया’ (बाइसन हॉर्न माड़िया) जनजाति की परंपराओं, जीवन-दर्शन और सांस्कृतिक चेतना का एक जीवंत दस्तावेज था। जैसे ही नर्तक दल मंच पर उतरा, उनकी विशिष्ट वेशभूषा ने उपस्थित जनसमूह का ध्यान सहज ही अपनी ओर आकर्षित कर लिया। पुरुष नर्तकों के सिर पर सजे गौर के सींगों वाले मुकुट, जिन्हें कौड़ियों और मोरपंखों से अलंकृत किया गया था, बस्तर की वन्य संस्कृति तथा गौर पशु के प्रति आदिवासी समाज के गहरे सम्मान और श्रद्धा को प्रतीकात्मक रूप से अभिव्यक्त कर रहे थे। वहीं पारंपरिक साड़ियों और आभूषणों से सुसज्जित महिला नर्तकियों ने जब अपने हाथों में थमी ‘तिरूडुडी’ (लोहे की छड़ी) को भूमि पर पटकते हुए ताल दी, तो एक अद्भुत, गूंजती और लयबद्ध ध्वनि ने वातावरण को मंत्रमुग्ध कर दिया। नृत्य के दौरान पुरुष नर्तकों ने गले में टंगे भारी ‘मांदरी’ ढोल को बजाते हुए जंगली भैंसे की आक्रामक, चंचल और ऊर्जावान मुद्राओं की प्रभावशाली नकल प्रस्तुत की। यह दृश्य दर्शकों को ऐसा अनुभव करा रहा था, मानो वे जंगल के सजीव और प्राकृतिक परिवेश के प्रत्यक्ष साक्षी बन गए हों। उल्लास और आनंद से परिपूर्ण इस नृत्य में माड़िया जनजाति की शिकार-परंपरा, साहस और अदम्य ऊर्जा स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती रही। गोलाकार घेरे में थिरकते युवक और उनके कदम से कदम मिलाती युवतियों ने यह सिद्ध कर दिया कि आधुनिकता के इस दौर में भी बस्तर ने अपनी सांस्कृतिक जड़ों को पूरी निष्ठा और गर्व के साथ संजोकर रखा है।









