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शिक्षा के प्रति सजग एवं शासन प्रशासन के बीच भय का वातावरण – शिक्षक रामचंद सोनवंशी

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शिक्षक जब अध्यापन के बजाय अपनी नौकरी बचाने में अधिक समय लगाते हैं, तो यह मुख्य रूप से अत्यधिक प्रशासनिक दबाव, नौकरी की असुरक्षा, और काम के भारी बोझ के कारण होता है। शिक्षा पर मनोवैज्ञानिक एवं अनुसंधान के अनुसार, पढ़ाते समय भी शिक्षक पर 36 प्रकार के एप मे काम थोपे जाते हैं, जिससे वे मानसिक रूप से थक जाते हैं। इस कारण वे कक्षा से ज्यादा कागजी कार्रवाई और रिपोर्ट जमा करने को महत्व देते हैं, जिससे शिक्षण की गुणवत्ता गिरती है और छात्र प्रभावित होते हैं।
इस स्थिति के मुख्य कारण और प्रभाव:
अत्यधिक काम और रिपोर्ट: प्रशासनिक कार्यों के दबाव के कारण शिक्षक पढ़ाने के बजाय रिपोर्ट और आंकड़े जमा करने में लगे रहते हैं।
नौकरी की असुरक्षा और कम वेतन: शिक्षक अपनी नौकरी बचाने की चिंता में ज्यादा व्यस्त रहते हैं, जिससे छात्रों का नुकसान होता है।
शिक्षक बर्नआउट: भारी काम के कारण शिक्षक मानसिक रूप से थक जाते हैं  जिससे उनका ध्यान पढ़ाने से हट जाता है।
शिक्षा का घटता स्तर: जब शिक्षक को स्वतंत्रता और भरोसा नहीं मिलता, तो शिक्षा निर्जीव हो जाती है।
रामचंद सोनवंशी ने  सरकार को देश के विकास एवं कर्मचारी हित में काम करने के लिए मिडिया के माध्यम अनुरोध करता है
छत्तीसगढ़ में टीईटी (CG TET) परीक्षा ने नियोजित और नियमित शिक्षकों में परीक्षा उत्तीर्ण करने की अनिवार्यता के कारण चिंता बढ़ा दी है। उम्र, लंबे समय से शिक्षण कार्य में व्यस्तता, और 60% (सामान्य) अंक की योग्यता जैसी चुनौतियां शिक्षकों में ‘भय का माहौल’ बना रही हैं, विशेषकर पुराने शिक्षकों के लिए।
मुख्य कारण और माहौल:
पात्रता का दबाव: स्थायी या संविदा शिक्षक, जो वर्षों से पढ़ा रहे हैं, उन्हें अब नौकरी की सुरक्षा के लिए यह परीक्षा पास
करना आवश्यक।
प्रतियोगी माहौल: 150 बहुविकल्पीय प्रश्नों वाली परीक्षा में 60% (90 सही प्रश्न) या आरक्षित वर्ग के लिए 50% (70 सही प्रश्न) प्राप्त करना चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है।
परीक्षा का डर: कई शिक्षक, विशेष रूप से उम्रदराज़ या जो थ्योरी से दूर हो चुके हैं, वे ‘कोई नकारात्मक अंकन नहीं’ होने के बावजूद परीक्षा के पैटर्न से चिंतित हैं।
आजीवन वैधता: अच्छी बात यह है कि परीक्षा पास करने पर प्रमाण पत्र की वैधता आजीवन है, लेकिन उस तक पहुँचने का संघर्ष शिक्षकों में भय उत्पन्न कर रहा है।
कुल मिलाकर, शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए लाई गई इस प्रक्रिया को कई शिक्षक एक कड़ी परीक्षा के रूप में देख रहे हैं।
भारत  सरकार और सरकारी शिक्षकों के बीच संबंध नीतिगत, प्रशासनिक और व्यावसायिक मुद्दों से घिरे हैं। जहाँ एक ओर सरकार (केंद्र/राज्य) राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत शिक्षा गुणवत्ता और ढांचागत सुधार (जैसे 6% GDP निवेश) पर जोर देती है, वहीं शिक्षकों पर चुनावी ड्यूटी व अन्य गैर-शैक्षणिक कार्यों का बोझ बना रहता है। शिक्षक अक्सर TET योग्यता, स्थानांतरण नीति और वेतन विसंगतियों को लेकर सरकार की नीतियों के खिलाफ आंदोलन करते हैं।
प्रमुख मुद्दे: शिक्षकों को ‘कर्मचारी’ के रूप में देखना, प्रशासनिक कार्य, व सीमित तकनीकी उपकरण।
सरकार का पक्ष: RTE अधिनियम के तहत शिक्षक-छात्र अनुपात (PTR), योग्यता का विकास और accountability (जवाबदेही) सुनिश्चित करना।
वर्तमान परिदृश्य: पुरानी पेंशन बहाली, तदर्थ (contract) शिक्षकों का नियमितीकरण और टेट (TET) अनिवार्यता जैसे विषयों पर अक्सर टकराव देखा जाता है।

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