Home चर्चा में सक्ती की बेटी को न्याय कब? आरोपी खुलेआम, माँ की पुकार अनसुनी

सक्ती की बेटी को न्याय कब? आरोपी खुलेआम, माँ की पुकार अनसुनी

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जांजगीर-चांपा संवाददाता – राजेंद्र प्रसाद जायसवाल
अभी तक पुलिस वाले कार्यवाही नहीं करना  जिला सकती पुलिस वाले संदिग्ध में है 
जिला सक्ती (छत्तीसगढ़) शक्ति जिले में 24 जनवरी 2026 को घटी एक दिल दहला देने वाली घटना ने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया है। वार्ड क्रमांक 11 झूलकदम निवासी व्याख्याता मीना मरावी की इकलौती 23 वर्षीय बेटी दिशा मरावी को कथित रूप से जिंदा जलाकर मार दिए जाने का आरोप है, लेकिन घटना के 20 दिन बाद भी नामजद आरोपी खुलेआम घूम रहे हैं। शोकाकुल माँ न्याय की गुहार लगा रही है और पुलिसिया कार्रवाई सवालों के घेरे में है।
24 जनवरी की दोपहर: एक फोन कॉल और उजड़ गया संसार
मीना मरावी के अनुसार, 24 जनवरी को दोपहर लगभग 1:40 बजे उन्हें सूचना मिली कि उनकी बेटी गंभीर रूप से जली हालत में बिहान नर्सिंग होम में भर्ती है। वहाँ से हालत नाजुक होने पर उसे BTRC हॉस्पिटल रेफर किया गया, जहाँ 1 फरवरी 2026 को उपचार के दौरान उसकी मृत्यु हो गई।
माँ का आरोप: सुनियोजित साजिश
मीना मरावी ने आरोप लगाया है कि योगेन्द्र कुमार साहू ने अपने साथियों महेन्द्र कुमार सिदार और आशीष पटेल के साथ मिलकर दिशा को होटल में बुलाया, उस पर तारपीन तेल डालकर आग लगा दी और फिर धमकी दी कि घटना को आत्मदाह बताया जाए।
यदि यह सच है तो यह केवल हत्या नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था पर सीधा तमाचा है।
पुलिस कार्रवाई पर गंभीर सवाल
दिशा की मौत के बाद तारबाहर पुलिस थाना में शून्य में अपराध दर्ज हुआ। परंतु मीना मरावी का कहना है कि:
नामजद आरोपियों को अब तक गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया?
मृत्यु पूर्व बयान (डाइंग डिक्लेरेशन) लिया गया या नहीं?
घटनास्थल की फोरेंसिक जांच हुई या नहीं?
होटल स्टाफ और प्रत्यक्षदर्शियों से पूछताछ क्यों नहीं?
सीसीटीवी फुटेज जब्त की गई या नहीं?
इन सवालों का जवाब प्रशासन को देना ही होगा।
“कछुए की चाल” से बढ़ रहा अविश्वास
एक ओर माँ अपनी इकलौती संतान को खोकर टूट चुकी है, दूसरी ओर आरोपियों का खुलेआम घूमना आम जनता में रोष पैदा कर रहा है। यदि आरोप गंभीर हैं तो तत्काल गिरफ्तारी, निष्पक्ष जांच और फास्ट ट्रैक ट्रायल आवश्यक है। देरी न्याय को संदिग्ध बनाती है।
शासन-प्रशासन से माँग
तीनों नामजद आरोपियों की तत्काल गिरफ्तारी।
डाइंग डिक्लेरेशन सार्वजनिक किया जाए (कानूनी प्रक्रिया के तहत)।
होटल परिसर की सीसीटीवी और फोरेंसिक रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।
मामले की उच्चस्तरीय, निष्पक्ष जांच हो।
पीड़ित परिवार को सुरक्षा और विधिक सहायता प्रदान की जाए।
सवाल जो गूंज रहे हैं
क्या एक शिक्षिका की बेटी को न्याय पाने के लिए भी सड़कों पर उतरना पड़ेगा?
क्या “पुलिस मेरी जेब में है” जैसी कथित धमकियाँ कानून के राज पर भारी पड़ेंगी?
दिशा मरावी की मौत सिर्फ एक परिवार का दुःख नहीं, बल्कि व्यवस्था की परीक्षा है। यदि इस मामले में शीघ्र और कठोर कार्रवाई नहीं हुई तो यह संदेश जाएगा कि कानून से ज्यादा प्रभाव और दबाव की ताकत चलती है।
अब निगाहें प्रशासन पर हैं—
क्या सक्ती की बेटी को न्याय मिलेगा, या यह मामला भी फाइलों में दफन हो जाएगा?

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