= मतांतरण के लिए नक्सलियों को विदेश से फंडिंग की भी चर्चा =
-अर्जुन झा-
जगदलपुर। क्या नक्सली बस्तर समेत पड़ोसी राज्यों के आदिवासी बाहुल्य इलाकों में धर्मांतरण गतिविधियों को बढ़ावा दे रहे हैं? क्या नक्सलियों के संरक्षण में धर्मांतरण का खेल चल रहा है? क्या इसके लिए मिशनरी या विदेशी संस्थाओं से नक्सली संगठनों को फंडिंग हो रही है? ये सवाल कुख्यात नक्सली कमांडर हिड़मा की मौत के बाद उसकी कब्र पर दीनकर्म करने के लिए बाहरी लोगों की भीड़ उमड़ने के बाद उठ रहे हैं।
सुकमा जिले के ग्राम पूवर्ती निवासी कुख्यात नक्सली हिड़मा और उसकी पत्नी राजे को मुठभेड़ में सुरक्षा बलों ने ढेर कर दिया था। वैधानिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद दोनों के शवों का अंतिम संस्कार ग्राम पूवर्ती के श्मशान घाट में किया गया था। दो दिन पहले आंध्रप्रदेश और तेलंगाना के करीब 80 लोग हिड़मा दंपत्ति के अंत्येष्टि स्थल पर पहुंचे थे। ये लोग वहां तथाकथित दीनकर्म कर रहे थे। ग्रामीणों के विरोध और शिकायत के बाद पुलिस मौके पर पहुंची। इन सभी बाहरी सभी लोगों को सुकमा जिला मुख्यालय ले जाकर पूछताछ की गई और सुबह उन्हें छोड़ दिया गया। इसके बाद अब सवाल उठ रहा है कि क्या हिड़मा अपना धर्म छोड़ कर मिशनरी के साथ हो लिया था, क्या उसने ईसाई धर्म अपना लिया था? हिड़मा के समर्थकों द्वारा सोशल मीडिया में डाली गई कई रील्स, पोस्ट और गीत भी इस बात की तस्दीक करते प्रतीत हो रहे हैं। हिड़मा के समर्थक ऐसे बताते और प्रचार करते आ रहे हैं कि जैसे वह अपने समाज में मसीही बनकर मसीहा का कार्य कर रहा था। अभी हाल में ही सर्व आदिवास समाज के एक कार्यक्रम में हिड़मा को मसीहा बताने वाला एक गीत चर्चा में रहा, जिसकी भी पुलिस अधीक्षक स्तर पर जांच हुई और फिर मामला रफा दफा कर दिया गया। पूवर्ती अंचल के कई ग्रामीणों का कहना है कि कथित दीनकर्म करने आए आंध्रप्रदेश और तेलंगाना के लोग धर्म विशेष से जुड़े हुए थे। नक्सलियों के मसीही धर्म के प्रति लगाव और हिंदुत्व के प्रति नफरत का एक उदाहरण यह भी है कि सुदूर बस्तर के जंगलों में नक्सलियों द्वारा आज तक कभी किसी चर्च को निशाना नहीं बनाया गया है। जबकि वहीं बारसूर की पहाड़ी पर स्थित भगवान गणेश की अति प्राचीन शिवलिंगों और दुर्गाजी की प्रतिमाओं को खंडित करने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। जबकि भगवान भोलेनाथ और आदिशक्ति मां दुर्गा आदिवासियों के आराध्य हैं।हालांकि नगा बटालियन जब सुकमा जिले में पदस्थ थी तो उनके कैंप में चर्च स्थापित हुए थे, जिसकी शिकायत तत्कालीन डीजीपी विश्वरंजन से की गई थी।कुछ माह बाद ही नगा बटालियन की वापसी बस्तर से हो गई। अब अगर नक्सली लीडरों के माध्यम से अगर कन्वर्जन की खबर आ रही है तो यह गंभीर विषय है क्योंकि इससे आदिवासी की संस्कृति बदलने का कृत्य इन नक्सली लीडरों द्वारा किया जा रहा है।









