डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का निधन 17 अप्रैल 1975 को हुआ था। इस दिन को उनकी पुण्यतिथि के रूप में मनाया जाता है। यह अवसर हमें उनके महान जीवन, उनके आदर्शों और उनके द्वारा दिए गए ज्ञान को याद करने का मौका देता है।
जीवन परिचय
डॉ. राधाकृष्णन का जन्म 5 सितंबर 1888 को तमिलनाडु के तिरुत्तनी में हुआ था। वे बचपन से ही मेधावी छात्र थे। उन्होंने दर्शनशास्त्र में विशेष रुचि ली और आगे चलकर एक प्रसिद्ध दार्शनिक के रूप में अपनी पहचान बनाई।
वे University of Oxford में भी प्रोफेसर रहे और भारतीय दर्शन को विश्व स्तर पर पहचान दिलाई।
शिक्षा और दर्शन में योगदान
डॉ. राधाकृष्णन ने भारतीय दर्शन को पश्चिमी दुनिया तक पहुँचाया। उन्होंने हिंदू धर्म और भारतीय संस्कृति को आधुनिक दृष्टिकोण से समझाने का प्रयास किया।
उनकी प्रमुख कृतियों में “Indian Philosophy” और “The Hindu View of Life” शामिल हैं, जो आज भी दर्शनशास्त्र के विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण हैं।
राजनीतिक जीवन
वे 1952 से 1962 तक भारत के उपराष्ट्रपति रहे और 1962 से 1967 तक भारत के राष्ट्रपति बने। उनका कार्यकाल सादगी, ईमानदारी और उच्च आदर्शों के लिए जाना जाता है।
शिक्षक के रूप में योगदान
डॉ. राधाकृष्णन एक आदर्श शिक्षक थे। उनके सम्मान में ही भारत में 5 सितंबर को Teachers’ Day मनाया जाता है। उनका मानना था कि शिक्षक समाज के निर्माण की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी होते हैं।
उनके विचार और आदर्श
उन्होंने हमेशा शिक्षा को समाज सुधार का माध्यम माना। उनके अनुसार—
- शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान देना नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण करना है।
- सच्चा शिक्षक वही है जो छात्रों में जिज्ञासा और नैतिकता का विकास करे।
पुण्यतिथि का महत्व
उनकी पुण्यतिथि हमें यह सिखाती है कि ज्ञान, विनम्रता और सेवा भाव जीवन के सबसे बड़े गुण हैं। इस दिन विभिन्न विद्यालयों और संस्थानों में उनके जीवन पर चर्चा, भाषण और श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।








