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“सुशासन की खुली पोल: फरसवानी में जनता तड़पती रही, बिजली विभाग सोता रहा”

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योगेन्द्र राठौर/कोरबा। भीषण गर्मी और उमस के बीच फरसवानी समेत आसपास के दर्जनों गांव पिछले लगभग दो दिनों से अंधेरे और पानी संकट की मार झेल रहे हैं। गांवों में हालात ऐसे बन गए हैं मानो प्रशासन और विद्युत विभाग ने ग्रामीणों को उनके हाल पर छोड़ दिया हो। बिजली गुल होने से बोर मशीनें बंद पड़ी हैं, पानी की भारी किल्लत है और लोग बूंद-बूंद पानी के लिए भटकने को मजबूर हैं।

ग्रामीणों का आरोप है कि हर महीने “मेंटेनेंस” के नाम पर घंटों बिजली कटौती करने वाला विभाग पहली ही आंधी और बारिश में पूरी तरह फेल साबित हो गया। सवाल उठ रहा है कि आखिर करोड़ों रुपये के रखरखाव और सुधार कार्य का लाभ जनता को क्यों नहीं मिल पा रहा? अगर थोड़ी सी बारिश में व्यवस्था चरमरा जाती है तो फिर विभागीय तैयारियों के दावे सिर्फ कागजों तक ही सीमित क्यों हैं?

फरसवानी और आसपास के गांवों में बिजली बंद होने से लोगों का जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया है। घरों में पंखे और कूलर बंद पड़े हैं, मोबाइल चार्ज नहीं हो पा रहे, छोटे बच्चे गर्मी से बिलख रहे हैं और बुजुर्ग पूरी रात जागकर काटने को मजबूर हैं। महिलाओं को दूर-दूर तक पानी की तलाश में भटकना पड़ रहा है।

ग्रामीणों का कहना है कि लगातार अधिकारियों को फोन किए जा रहे हैं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी फोन उठाना तक जरूरी नहीं समझ रहे। इससे लोगों में भारी नाराजगी है। लोगों का आरोप है कि जनता गर्मी और अंधेरे में तड़प रही है, जबकि जिम्मेदार अधिकारी एसी कमरों में बैठकर सिर्फ औपचारिकताएं निभा रहे हैं।

यह स्थिति सरकार के उन “जन समस्या निवारण शिविरों” और “सुशासन” के दावों पर भी बड़ा सवाल खड़ा कर रही है, जिनका लगातार प्रचार किया जाता है। ग्रामीण पूछ रहे हैं कि जब गांवों को बिजली और पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं तक समय पर नहीं मिल पा रहीं, तो आखिर ऐसे शिविरों और दावों का फायदा क्या है? क्या यह सब सिर्फ फोटो खिंचवाने और प्रचार तक सीमित है?

वहीं विभागीय कर्मचारियों का कहना है कि स्टाफ की भारी कमी के बावजूद कर्मचारी लगातार कई रातों से फॉल्ट सुधारने में लगे हुए हैं। लेकिन ग्रामीण सवाल उठा रहे हैं कि जब हर साल आंधी और बारिश का मौसम आता है, तब विभाग पहले से पर्याप्त तैयारी क्यों नहीं करता? आखिर हर बार जनता को ही परेशानी क्यों झेलनी पड़ती है?

अब ग्रामीणों का गुस्सा खुलकर सामने आने लगा है।

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर कब तक गांवों को अंधेरे और बदहाली में जीने के लिए मजबूर किया जाएगा? और कब तक जिम्मेदार अधिकारी सिर्फ फाइलों में “व्यवस्था दुरुस्त” लिखकर अपनी जिम्मेदारी से बचते रहेंगे?

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