जांजगीर-चांपा संवाददाता – राजेन्द्र जायसवाल
जिला जांजगीर-चांपा।
चांपा में शुक्रवार 29 मई 2026 को चांपा स्थित धानमंडी प्रांगण में आयोजित तिरुपति मिनरल्स कंपनी की जनसुनवाई उस समय भारी विरोध और जनआक्रोश का केंद्र बन गई, जब आसपास के गांवों से पहुंचे सैकड़ों ग्रामीणों ने कंपनी और प्रशासन के खिलाफ जमकर नारेबाजी करते हुए परियोजना का विरोध किया। ग्रामीणों का आरोप था कि उद्योग पहले स्थापित कर दिया जाता है और बाद में औपचारिकता पूरी करने के लिए जनसुनवाई आयोजित की जाती है। लोगों ने इसे जनता को गुमराह करने की प्रक्रिया बताते हुए कहा कि यदि वास्तव में जनहित की चिंता होती तो पहले ग्रामीणों की राय ली जाती, पर्यावरणीय प्रभाव का निष्पक्ष अध्ययन कराया जाता और उसके बाद ही किसी उद्योग को अनुमति दी जाती।
हथनेवरा, अफरीद, सोंठी, पिथमपुर, मुड़पार, कोटाडबरी सहित आसपास के अनेक गांवों से बड़ी संख्या में महिला एवं पुरुष ग्रामीण जनसुनवाई में पहुंचे। पूरे कार्यक्रम के दौरान ग्रामीणों का एक ही सवाल था — “जब पहले से ही क्षेत्र धूल, प्रदूषण और बीमारी से जूझ रहा है, तो नया विस्तार आखिर किसके हित में किया जा रहा है?” ग्रामीणों का कहना था कि उद्योगों के कारण क्षेत्र की हवा जहरीली होती जा रही है, खेतों की उपज प्रभावित हो रही है और लोग गंभीर बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं, लेकिन शासन-प्रशासन केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित है।
“स्थानीयों को रोजगार नहीं, सिर्फ प्रदूषण”
जनसुनवाई में सबसे बड़ा मुद्दा रोजगार का रहा। ग्रामीणों ने खुलकर आरोप लगाया कि तिरुपति मिनरल्स ने पहले भी स्थानीय युवाओं को रोजगार देने के नाम पर बड़े-बड़े वादे किए थे, लेकिन वास्तविकता यह है कि अधिकतर नौकरियां बाहरी लोगों को दी गईं। स्थानीय युवक आज भी बेरोजगारी और पलायन के लिए मजबूर हैं।
ग्रामीणों ने कहा कि कंपनी हर बार विकास, रोजगार और क्षेत्रीय उन्नति का सपना दिखाती है, लेकिन जमीनी स्तर पर गांवों को केवल धूल, धुआं और बीमारियां ही मिलती हैं। महिलाओं ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि उनके बच्चे लगातार धूलभरी हवा में सांस लेने को मजबूर हैं। गांवों में खांसी, सांस संबंधी बीमारियां और त्वचा रोग तेजी से बढ़ रहे हैं। लोगों ने यह भी कहा कि यदि यही स्थिति रही तो आने वाले समय में कैंसर और सिलिकोसिस जैसी घातक बीमारियां पूरे क्षेत्र में महामारी का रूप ले सकती हैं।

पर्यावरण पर मंडराता बड़ा खतरा
ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि तिरुपति मिनरल्स और आसपास संचालित अन्य उद्योग पर्यावरणीय नियमों का पालन नहीं कर रहे हैं। भारी वाहनों की आवाजाही से गांवों की सड़कें खराब हो चुकी हैं। खेतों पर धूल की मोटी परत जम जाती है जिससे उत्पादन प्रभावित हो रहा है। कई किसानों ने बताया कि पहले जहां खेतों में अच्छी पैदावार होती थी, अब मिट्टी की गुणवत्ता खराब होती जा रही है।
जनसुनवाई में उपस्थित लोगों ने कहा कि पर्यावरण विभाग केवल औपचारिक निरीक्षण करता है। प्रदूषण नियंत्रण के नाम पर कंपनियां कागजों में नियमों का पालन दिखाती हैं, जबकि वास्तविक स्थिति बेहद चिंताजनक है। ग्रामीणों ने मांग की कि किसी स्वतंत्र एजेंसी से पर्यावरणीय प्रभाव का निष्पक्ष सर्वे कराया जाए और प्रभावित गांवों की स्वास्थ्य जांच कराई जाए।
“जनसुनवाई या औपचारिकता?”
ग्रामीणों का आरोप था कि अधिकांश लोगों को यह तक स्पष्ट जानकारी नहीं थी कि तिरुपति मिनरल्स की परियोजना में आखिर किस प्रकार का कार्य किया जाएगा। लोगों ने कहा कि ग्रामीणों को परियोजना की पूरी जानकारी दिए बिना जनसुनवाई आयोजित करना केवल औपचारिकता निभाना है। कई लोगों ने आरोप लगाया कि सूचना समय पर नहीं दी गई और ग्रामीणों की वास्तविक आपत्तियों को दबाने की कोशिश की गई।
महिलाओं ने कहा कि गांवों में न तो सही ढंग से सूचना पहुंचाई गई और न ही परियोजना के संभावित दुष्प्रभावों के बारे में बताया गया। ऐसे में जनसुनवाई का उद्देश्य ही संदिग्ध दिखाई देता है। ग्रामीणों ने यह भी कहा कि यदि प्रशासन निष्पक्ष होता तो प्रभावित गांवों में जाकर खुली बैठक आयोजित करता, ताकि हर व्यक्ति अपनी बात रख सके।

बीमारी, धूल और डर के बीच जी रहे ग्रामीण
हथनेवरा और सोंठी गांव के लोगों ने सबसे अधिक चिंता व्यक्त की। ग्रामीणों का कहना था कि यदि परियोजना का विस्तार हुआ तो सबसे ज्यादा प्रभाव इन्हीं गांवों पर पड़ेगा। लोगों ने कहा कि अभी से घरों में धूल भर जाती है, पानी दूषित हो रहा है और बच्चों तथा बुजुर्गों का स्वास्थ्य लगातार बिगड़ रहा है।
ग्रामीणों ने कहा कि उद्योगों के कारण खेतों में काम करना मुश्किल होता जा रहा है। पशुधन भी प्रभावित हो रहा है। गांवों के तालाब और जलस्रोत प्रदूषण की चपेट में हैं। लोगों का आरोप था कि प्रशासन को इन समस्याओं की जानकारी होने के बावजूद कार्रवाई नहीं की जा रही।
शासन-प्रशासन की भूमिका पर उठे सवाल
जनसुनवाई के दौरान लोगों का गुस्सा केवल कंपनी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि शासन-प्रशासन पर भी गंभीर सवाल उठे। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि प्रशासन हमेशा कंपनियों के पक्ष में खड़ा दिखाई देता है, जबकि आम जनता की समस्याओं को नजरअंदाज कर दिया जाता है।
लोगों ने कहा कि यदि किसी गरीब किसान या आम व्यक्ति से छोटी गलती हो जाए तो प्रशासन तुरंत कार्रवाई करता है, लेकिन उद्योगों द्वारा फैलाए जा रहे प्रदूषण और नियमों के उल्लंघन पर चुप्पी साध ली जाती है। ग्रामीणों ने मांग की कि तिरुपति मिनरल्स की गतिविधियों की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए और पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन पाए जाने पर सख्त कार्रवाई हो।
“विकास” के नाम पर गांवों का विनाश?
ग्रामीणों ने कहा कि उद्योगों को हमेशा विकास का प्रतीक बताकर प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन वास्तविक विकास तब माना जाएगा जब स्थानीय लोगों को रोजगार मिले, गांवों की स्थिति सुधरे और पर्यावरण सुरक्षित रहे। यदि उद्योग केवल मुनाफा कमाने के लिए स्थापित किए जाएं और गांवों को बीमारियों तथा प्रदूषण की तरफ धकेल दिया जाए, तो इसे विकास नहीं बल्कि विनाश कहा जाएगा।
लोगों ने कहा कि उद्योग स्थापित होने के बाद गांवों में न तो स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ीं, न शिक्षा व्यवस्था सुधरी और न ही रोजगार के अवसर पैदा हुए। उल्टा ग्रामीणों को प्रदूषण, सड़क दुर्घटनाओं और स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
महिलाओं की चिंता : “बच्चों का भविष्य खतरे में”
जनसुनवाई में शामिल महिलाओं ने कहा कि उन्हें सबसे ज्यादा चिंता अपने बच्चों के भविष्य की है। उन्होंने कहा कि गांवों में लगातार बढ़ते प्रदूषण के कारण बच्चों का स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है। धूल और धुएं के कारण छोटे बच्चों को सांस लेने में परेशानी हो रही है। कई महिलाएं भावुक होकर बोलीं कि यदि अभी आवाज नहीं उठाई गई तो आने वाली पीढ़ियां गंभीर बीमारियों का शिकार हो जाएंगी।
महिलाओं ने यह भी आरोप लगाया कि कंपनियां CSR और सामाजिक जिम्मेदारी की बातें तो करती हैं, लेकिन गांवों में वास्तविक रूप से कोई सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई जातीं। लोगों ने कहा कि यदि कंपनी वास्तव में क्षेत्र का विकास चाहती है तो पहले गांवों के स्वास्थ्य, पानी और रोजगार की समस्याओं को दूर करे।
“बाहर वालों को नौकरी, स्थानीयों को उपेक्षा”
युवाओं ने कहा कि उद्योग लगने के समय स्थानीय लोगों से रोजगार देने का वादा किया जाता है, लेकिन बाद में तकनीकी योग्यता और अनुभव के नाम पर बाहरी लोगों की भर्ती कर ली जाती है। स्थानीय युवा बेरोजगार रह जाते हैं और उन्हें पलायन के लिए मजबूर होना पड़ता है।
ग्रामीणों ने कहा कि यदि स्थानीय लोगों को ही रोजगार नहीं मिलेगा तो फिर उद्योग स्थापित करने का लाभ क्षेत्र को कैसे मिलेगा? युवाओं ने मांग की कि किसी भी उद्योग में कम से कम 75 प्रतिशत रोजगार स्थानीय युवाओं को अनिवार्य रूप से दिया जाए।
प्रशासन को अब जागना होगा
जनसुनवाई में हुए भारी विरोध ने यह स्पष्ट कर दिया कि अब ग्रामीण बिना सवाल किए किसी भी परियोजना को स्वीकार करने के मूड में नहीं हैं। लोग अपने स्वास्थ्य, पर्यावरण और अधिकारों को लेकर जागरूक हो रहे हैं। प्रशासन के लिए यह एक गंभीर संकेत है कि यदि समय रहते ग्रामीणों की समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले समय में आंदोलन और तेज हो सकते हैं।
जनता का कहना है कि यदि शासन-प्रशासन वास्तव में कागजी रिपोर्टों के आधार पर किसी परियोजना को अनुमति देना भविष्य बड़े संकट है तो उसे ग्रामीणों की मांगों को गंभीरता से लेना चाहिए। केवल औपचारिक जनसुनवाई और कागजी रिपोर्टों के आधार पर किसी परियोजना को अनुमति देना भविष्य में बड़े संकट को जन्म दे सकता है।
ग्रामीणों की प्रमुख मांगें
तिरुपति मिनरल्स की परियोजना और विस्तार की निष्पक्ष जांच हो।
प्रभावित गांवों में स्वास्थ्य शिविर लगाकर लोगों की जांच कराई जाए।
पर्यावरणीय प्रभाव का स्वतंत्र सर्वे कराया जाए।
स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता के आधार पर रोजगार दिया जाए।
प्रदूषण नियंत्रण के नियमों का कड़ाई से पालन कराया जाए।
ग्राम सभाओं की सहमति के बिना किसी परियोजना को अनुमति न दी जाए।
प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर कठोर कार्रवाई हो।
निष्कर्ष
तिरुपति मिनरल्स की जनसुनवाई में उमड़ा जनआक्रोश केवल एक कंपनी के खिलाफ विरोध नहीं था, बल्कि यह उस व्यवस्था के खिलाफ भी आवाज थी जिसमें ग्रामीणों को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। लोग अब अपने अधिकारों, पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को लेकर खुलकर सामने आ रहे हैं।
यदि शासन-प्रशासन ने इस विरोध को केवल एक औपचारिक घटना मानकर अनदेखा किया, तो आने वाले समय में स्थिति और गंभीर हो सकती है। जरूरत इस बात की है कि विकास और उद्योग के नाम पर ग्रामीणों के स्वास्थ्य और पर्यावरण से समझौता न किया जाए। वास्तविक विकास वही होगा जिसमें उद्योग, पर्यावरण और आम जनता — तीनों के हितों का संतुलन बना








