धरती फिर से श्रृंगार सजाने वाली है,
वर्षा की ऋतु दस्तक देने वाली है।
उमड़-घुमड़ कर बादल छाने वाले हैं,
रिमझिम फुहारों के गीत सुनाने वाले हैं।
सूखी धरती की प्यास बुझने वाली है,
हरियाली फिर से मुस्काने वाली है।
माटी की सोंधी खुशबू महकने वाली है,
प्रकृति नई छटा बिखेरने वाली है।
नदियाँ फिर कल-कल गाने वाली हैं,
झरनों की धुन गूँजने वाली है।
पेड़-पौधों में नई उमंग जागेगी,
कली-कली फिर अपने रंग बिखेरेगी।
तपती धूप का असर घटने वाला है,
सावन का सुहाना सफ़र शुरू होने वाला है।
धरती फिर से श्रृंगार सजाने वाली है,
वर्षा की ऋतु जीवन में नव उल्लास लाने वाली है।
✍️: राजकुमार सोनी, रायपुर (छत्तीसगढ़)








