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मौत के साए में पढ़ाई: रायपुर के दलदल सिवनी स्कूल में 15 करोड़ के बजट के बाद भी ढह रही हैं दीवारें, सहमे बच्चे पूछ रहे – क्या हम सुरक्षित घर लौट पाएंगे?

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रायपुर संवाददाता – रघुराज
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से एक बेहद हैरान और विचलित कर देने वाला मामला सामने आया है। शिक्षा का मंदिर कहे जाने वाले स्कूल आज भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही के चलते बच्चों के लिए मौत का कुआं बनते जा रहे हैं। मामला रायपुर के दलदल सिवनी स्थित शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय का है, जहां रोजाना सैकड़ों बच्चे अपनी जान हथेली पर रखकर पढ़ने को मजबूर हैं। स्कूल का गेट पार करते ही मासूम विद्यार्थियों के मन में सिर्फ एक ही डर सताता है कि कहीं आज उनका इस दुनिया में अंतिम दिन तो नहीं? क्या वे शाम को सही-सलामत अपने माता-पिता के पास घर लौट पाएंगे? यह कोई किसी फिल्म की डरावनी कहानी या फिल्मी डायलॉग नहीं है, बल्कि रायपुर के इस सरकारी स्कूल की कड़वी और खौफनाक हकीकत बन चुकी है।
बाहर से चकाचक दिखने वाली इस इमारत के अंदर का सच बेहद डरावना है। दूर से देखने पर यह स्कूल भवन किसी आधुनिक और सर्वसुविधायुक्त शिक्षा मंदिर जैसा प्रतीत होता है, लेकिन जैसे ही कोई इसके अंदर कदम रखता है, उसे असलियत का पता चलता है। स्कूल की फर्श पैर रखते ही नीचे धंसने लगती है। दीवारों, छतों और यहां तक कि पूरी इमारत की नींव में बड़ी-बड़ी और गहरी दरारें आ चुकी हैं। स्थिति इतनी नाजुक हो चुकी है कि मानो यह पूरा भारी-भरकम भवन किसी भी पल भरभराकर ढह जाएगा। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि मुख्य स्कूल भवन मात्र तीन साल पुराना है और अतिरिक्त कक्ष को बने तो अभी केवल दो साल ही हुए हैं। लेकिन इनकी हालत देखकर ऐसा लगता है जैसे यह कोई 100 या 150 साल पुरानी जर्जर और परित्यक्त इमारत हो।
इस पूरी बदहाली के पीछे करोड़ों रुपये का भ्रष्टाचार और सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत साफ तौर पर नजर आ रही है। मिली जानकारी के मुताबिक, लोक निर्माण विभाग यानी पीडब्ल्यूडी ने साल 2019 में इस स्कूल के मुख्य भवन का निर्माण पूरा किया था। इसके बाद साल 2023 में यहां विद्यार्थियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए अतिरिक्त कक्षों का निर्माण कराया गया और इसे स्कूल प्रबंधन को हैंडओवर कर दिया गया। विभागीय सूत्रों और दस्तावेजों की मानें तो इस पूरे स्कूल परिसर के निर्माण में कुल मिलाकर 15 करोड़ रुपये से अधिक की भारी-भरकम राशि खर्च की गई थी। अब जनता और अभिभावकों का यह बड़ा सवाल है कि यदि 15 करोड़ रुपये जैसी मोटी रकम खर्च की गई थी, तो फिर मात्र दो-तीन सालों में ही इमारत इस कदर जर्जर कैसे हो गई? इस बात की पूरी आशंका जताई जा रही है कि निर्माण कार्य के दौरान इसकी नींव में बड़े पैमाने पर घटिया सामग्री का उपयोग कर भ्रष्टाचार का खेल खेला गया।
इमारत की इस खतरनाक स्थिति के कारण अब स्कूल में पढ़ने वाले सैकड़ों छात्र-छात्राओं की जान पर सीधा खतरा मंडरा रहा है। क्लास में बैठकर पढ़ाई करते समय बच्चों का ध्यान ब्लैकबोर्ड पर कम और छत की दरारों पर ज्यादा रहता है। कब छत का प्लास्टर गिर जाए या कब पूरी दीवार ढह जाए, इस डर से बच्चे सहमे रहते हैं। अभिभावक भी अपने बच्चों को स्कूल भेजने से कतराने लगे हैं। उनका कहना है कि वे अपने बच्चों को उज्ज्वल भविष्य बनाने के लिए स्कूल भेजते हैं, ना कि किसी हादसे का शिकार होने के लिए। 15 करोड़ रुपये का भारी बजट ठिकाने लगाने के बाद भी अगर बच्चों को ऐसी डरावनी व्यवस्था मिल रही है, तो यह पूरे सिस्टम के लिए एक शर्मनाक बात है।
इस मामले में लोक निर्माण विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों और ठेकेदार की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। निर्माण कार्य पूरा होने के बाद क्या अधिकारियों ने इसकी गुणवत्ता की जांच नहीं की थी? दो साल पहले बने अतिरिक्त कक्ष की दीवारें अगर आज फट रही हैं, तो इसके लिए जिम्मेदार ठेकेदार पर अब तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई? क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है, जिसके बाद ही जांच समितियां बनाई जाएंगी? दलदल सिवनी के इस शासकीय स्कूल की तस्वीरें और वहां का माहौल चीख-चीखकर यह बता रहा है कि विकास के दावों के पीछे भ्रष्टाचार की नींव कितनी खोखली है। स्थानीय नागरिकों और पीड़ित अभिभावकों ने मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री से इस मामले में तुरंत हस्तक्षेप करने की मांग की है। लोगों का कहना है कि इस पूरे निर्माण कार्य की उच्च स्तरीय तकनीकी जांच कराई जानी चाहिए और दोषी इंजीनियरों व ठेकेदार को तत्काल सस्पेंड कर उनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज होना चाहिए। इसके साथ ही, बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था की जानी चाहिए ताकि मासूमों को इस खौफनाक माहौल से निकाला जा सके।

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