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जीवन की धूप-छाँव: अगर सब कुछ मनचाहा होता तो क्या सच में जीवन सुंदर होता?

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काश ये जीवन मनचाहा होता,
कितना सुंदर, कितना सजीला होता।
हर दिन एक नई सौगात लिए होता,
हर पल कोई मीठा सा गीत होता।

अगर ये जीवन सीधी रेखा होता,
न कोई उतार, न कोई चढ़ाव होता।
संघर्षों का कोई नाम न होता,
अनुभवों का भी कोई काम न होता।

अगर ये जीवन एकाकी होता,
न कोई अपना, न कोई पराया होता।
न रिश्तों का कोई संसार होता,
न भावों का कोई आधार होता।

पर जीवन तो धूप-छाँव का मेल है,
कभी सुख है तो कभी दुख का खेल है।
हर मोड़ पर नई कहानी लिखता है,
तभी तो जीवन सच में जीवंत लगता है।

✍️: राजकुमार सोनी, रायपुर (छत्तीसगढ़)

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