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माता पिता का त्याग और आधुनिकता की अंधी दौड़ में टूटते पारिवारिक रिश्तों का कड़वा सच

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रघुराज –

हरियाणा के सोनीपत स्थित एक वृद्धाश्रम में एक ऐसी घटना घटी है जिसने समाज को झकझोर कर रख दिया है और संस्कारों तथा शिक्षा की वर्तमान दिशा पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। मुंबई के कभी बहुत बड़े और प्रतिष्ठित कपड़ा व्यापारी रहे 74 वर्षीय शिवचरण रामरत्न गुप्ता की सोनीपत के एक वृद्धाश्रम में शांतिपूर्वक मृत्यु हो गई। वे पिछले तीन वर्षों से अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद और उससे पहले भी इसी आश्रम में अपना जीवन बिता रहे थे। दो वर्ष पूर्व उनकी धर्मपत्नी ने भी इसी वृद्धाश्रम में अंतिम सांस ली थी।

मंगलवार की सुबह जब आश्रम प्रबंधन ने उनकी मृत्यु की दुखद सूचना उनकी उन तीन बेटियों को दी जिन्हें उन्होंने पढ़ा-लिखाकर एक सम्मानीय शिक्षक बनाया था, तो समाज को एक बार फिर रिश्तों के खोखलेपन का अहसास हुआ। तीनों बेटियों ने दूरी और समय के अभाव का हवाला देते हुए अपने जन्मदाता पिता के अंतिम संस्कार में सम्मिलित होने से साफ इनकार कर दिया। जिस पिता ने अपनी कमाई का पाई-पाई जोड़कर बेटियों को इस योग्य बनाया कि वे समाज में गुरु का दर्जा पा सकें, उसी पिता की देह को अंतिम विदाई देने के लिए बेटियों के पास कुछ घंटे का समय भी नहीं था।

व्यापारिक वैभव से वृद्धाश्रम तक का कष्टदायी सफर
शिवचरण रामरत्न गुप्ता जी का जीवन हमेशा से ऐसा नहीं था। एक समय था जब मुंबई के कपड़ा बाजार में उनके नाम की साख हुआ करती थी। उन्होंने अपने जीवनकाल में काफी नाम और धन कमाया। अपनी तीनों बेटियों के पालन-पोषण में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्हें बेहतरीन शिक्षा दिलाई, अच्छे संस्कार देने का प्रयास किया और उन्हें अपने पैरों पर खड़ा किया। तीनों बेटियां आज सरकारी व निजी क्षेत्र में शिक्षिका के पद पर कार्यरत हैं और समाज को नई पीढ़ी गढ़ने की सीख देती हैं।

लेकिन समय का चक्र ऐसा घूमा कि बुढ़ापे की दहलीज पर कदम रखते ही संपत्ति और जिम्मेदारियों के बंटवारे के बीच शिवचरण जी और उनकी पत्नी खुद को बेगाने महसूस करने लगे। जिस घर को उन्होंने अपने पसीने से सींचा था, वहां उनके लिए जगह कम पड़ने लगी। आघात तब और गहरा हुआ जब अंततः उन्हें वृद्धाश्रम का रुख करना पड़ा। पिछले तीन सालों से सोनीपत का यह वृद्धाश्रम ही उनका घर बन चुका था, जहां वे अपनों के एक फोन या एक मुलाकात की आस में दिन गुजारते थे।

अंतिम संस्कार से दूरी और समय की मजबूरी का बहाना
मंगलवार की सुबह जब शिवचरण जी ने अंतिम सांस ली, तो आश्रम प्रबंधन ने तुरंत उनकी तीनों बेटियों से संपर्क किया। उम्मीद थी कि पिता के जाने की खबर सुनकर बेटियां कम से कम आखिरी बार उनका चेहरा देखने और अंतिम रस्मों को पूरा करने जरूर आएंगी। लेकिन फोन पर मिला उत्तर आश्रम के कर्मचारियों के साथ-साथ वहां रह रहे अन्य बुजुर्गों के दिलों को छलनी कर गया।

तीनों बेटियों ने व्यावहारिक व्यस्तताओं, रास्ते की दूरी और समय की कमी का कारण बताते हुए आने से मना कर दिया। उन्होंने आश्रम प्रशासन को ही अपने स्तर पर अंतिम संस्कार करने की बात कह दी। यह घटना दर्शाती है कि आधुनिक शिक्षा और व्यावसायिक सफलता ने मनुष्य को इतना व्यावहारिक और निष्ठुर बना दिया है कि उसमें से मानवीय संवेदनाएं और पितृ-ऋण की भावना पूरी तरह खत्म होती जा रही है।

जाते जाते दो बेनूर जिंदगियों को दे गए नई रोशनी
शिवचरण जी भले ही अपने जीवन के अंतिम वर्षों में अपनी संतानों के स्नेह और अपनत्व के लिए तरसते रहे, लेकिन उनके हृदय में समाज के प्रति करुणा और दया का भाव रत्ती भर भी कम नहीं हुआ था। वे जानते थे कि शरीर तो नश्वर है, लेकिन अगर उनके अंग किसी के काम आ सकें तो इससे बड़ा पुण्य कुछ नहीं हो सकता।

आश्रम संचालक आनंद कुमार ने बताया कि शिवचरण जी ने अपने जीवनकाल में ही मरणोपरांत नेत्रदान करने का दृढ़ संकल्प लिया था। वे अक्सर कहा करते थे कि अगर मेरी आंखों से किसी अंधियारी दुनिया में उजाला हो सके, तो मेरा जीवन सार्थक हो जाएगा। मंगलवार सुबह करीब 7 बजे डॉक्टरों की एक विशेष टीम वृद्धाश्रम पहुंची और पूरी चिकित्सकीय मर्यादा तथा सम्मान के साथ उनकी आंखें दान कराई गईं। इस प्रकार, मृत्यु के पश्चात भी शिवचरण जी दो दृष्टिहीन लोगों की आंखों की रोशनी बन गए और जाते-जाते समाज को एक बहुत बड़ा संदेश दे गए।

वृद्धाश्रम ही बना अंतिम यात्रा का साक्षी और परिवार
जब अपनी जन्म देने वाली औलाद ने दूरी बना ली, तब आश्रम के कर्मचारियों और वहां रह रहे अन्य बुजुर्गों ने ही शिवचरण जी का परिवार बनकर उनकी अंतिम यात्रा की व्यवस्था की। आश्रम के संचालक और कर्मचारियों ने नम आंखों से उनका अंतिम संस्कार हिंदू रीति-रिवाज के साथ संपन्न कराया।

आश्रम संचालक आनंद कुमार ने दुख व्यक्त करते हुए कहा कि आज का समाज किस दिशा में जा रहा है, यह सोचकर भी डर लगता है। जो बेटियां खुद शिक्षिका हैं और दूसरों के बच्चों को नैतिकता, मूल्य और मानवीय संवेदनाओं का पाठ पढ़ाती हैं, जब वे ही अपने पिता के अंतिम समय में साथ खड़ी नहीं हो सकीं, तो हम समाज से क्या उम्मीद कर सकते हैं। शिवचरण जी पूरे जीवन अपनी बेटियों की सफलता पर गर्व करते रहे, लेकिन उनकी बेटियों ने उनके अंतिम समय में जो रुख अपनाया, वह समाज के लिए एक चिंताजनक मिसाल है।

आधुनिक शिक्षा व्यवस्था और गिरते नैतिक मूल्यों पर विचारणीय प्रश्न
यह दुखद घटना केवल एक परिवार की कहानी नहीं है, बल्कि यह हमारे पूरे सामाजिक ढांचे पर एक करारा प्रहार है। आज हम बच्चों को डिग्री, पद और आर्थिक संपन्नता तो दे रहे हैं, लेकिन उन्हें संवेदनशील इंसान बनाना भूल रहे हैं।

किताबों में माता-पिता की सेवा का पाठ पढ़ाने वाले शिक्षक जब खुद अपने जीवन में इसका पालन नहीं करते, तो शिक्षा की सार्थकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। शिवचरण रामरत्न गुप्ता की कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर हम अपनी आने वाली पीढ़ी को किस प्रकार के संस्कार दे रहे हैं।

शिवचरण जी भले ही इस भौतिक संसार को अलविदा कह चुके हैं, लेकिन उनकी दान की गई आंखें आज भी इस दुनिया को देख रही हैं। वे अपनी बेटियों को तो अपना समय न दे सके, लेकिन दो अनजान चेहरों को जिंदगी भर के लिए रोशनी का तोहफा दे गए। समाज को यह तय करना होगा कि क्या केवल आर्थिक रूप से सक्षम होना ही सफलता है, या फिर अपने बुजुर्गों का सम्मान और सेवा करना ही जीवन का सच्चा धर्म है।

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