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कंधों पर मरीज, सवालों के घेरे में सरकारी दावे!

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-2 किलोमीटर तक झलगी में मरीज को लेकर चले ग्रामीण, कुसमी के भईसापाठ की तस्वीर ने खोली स्वास्थ्य और सड़क व्यवस्था की पोल

युसूफ खान/बलरामपुर/कुसमी |  

सरकार गांव-गांव बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं और सड़क कनेक्टिविटी पहुंचाने के बड़े-बड़े दावे कर रही है, लेकिन बलरामपुर जिले के कुसमी जनपद पंचायत क्षेत्र के भईसापाठ से सामने आई एक तस्वीर इन दावों की जमीनी हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े करती नजर आ रही है।

यहां एक मरीज को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए ग्रामीणों को झलगी का सहारा लेकर करीब 2 किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ा। तस्वीर में ग्रामीण मरीज को झलगी में लेकर कच्चे रास्ते से अस्पताल की ओर जाते दिखाई दे रहे हैं। यह स्थिति ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता को लेकर जिम्मेदारों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती है।

बीमार पड़ा ग्रामीण तो एंबुलेंस के बजाय कंधों का सहारा

ग्रामीण क्षेत्रों में किसी व्यक्ति के अचानक गंभीर रूप से बीमार पड़ने पर सबसे पहली जरूरत समय पर चिकित्सा सुविधा और अस्पताल तक पहुंचने की होती है। लेकिन अगर सड़क की स्थिति ऐसी हो कि एंबुलेंस पहुंचना मुश्किल हो और मरीज को ग्रामीणों के कंधों के सहारे ले जाना पड़े, तो सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ जरूरतमंद ग्रामीणों तक किस तरह पहुंच रहा है?

भईसापाठ की यह तस्वीर महज एक मरीज को झलगी में ले जाने की तस्वीर नहीं, बल्कि दुर्गम ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य व्यवस्था और सड़क सुविधा की जमीनी स्थिति का आईना नजर आ रही है।

जिम्मेदारों से ग्रामीणों के सीधे सवाल

ग्रामीणों की परेशानी को लेकर कई सवाल सामने आ रहे हैं—

– क्या पंचायत के जनप्रतिनिधियों ने इस समस्या को संबंधित अधिकारियों के सामने उठाया है?
– क्या जिला प्रशासन को भईसापाठ क्षेत्र की वास्तविक स्थिति की जानकारी है?
– क्या इस क्षेत्र में एंबुलेंस की पहुंच सुनिश्चित करने के लिए कोई ठोस व्यवस्था है?
– सड़क और स्वास्थ्य सुविधा के अभाव में ग्रामीण आखिर कब तक मरीजों को कंधों पर ढोते रहेंगे?

बीमारी इंतजार नहीं करती, व्यवस्था को समय पर पहुंचना होगा

ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं का सीधा संबंध लोगों की जिंदगी से है। गंभीर बीमारी या आपात स्थिति में अस्पताल तक पहुंचने में हुई देरी मरीज के लिए भारी पड़ सकती है। ऐसे में केवल योजनाओं और सुविधाओं के दावों से नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर बेहतर कनेक्टिविटी और स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता से ही ग्रामीणों को वास्तविक राहत मिल सकती है।

अब देखना होगा कि जिला प्रशासन, पंचायत के जिम्मेदार जनप्रतिनिधि और स्थानीय नेता भईसापाठ की इस तस्वीर को कितनी गंभीरता से लेते हैं और ग्रामीणों की इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए क्या कदम उठाते हैं।

न्यूज़ छत्तीसगढ़ का सवाल

“जब मरीज को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए एंबुलेंस नहीं, बल्कि झलगी और कंधों का सहारा लेना पड़े… तो फिर गांव तक पहुंचा विकास आखिर कहां है?”

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