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हरतालिका तीज आज: सुहागिनों और कुंवारी कन्याओं के लिए विशेष है यह व्रत

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पति की लंबी उम्र और अखंड सौभाग्य की कामना से रखती हैं महिलाएं, कुंवारी कन्याएं करती हैं मनचाहे जीवनसाथी की कामना

संवाददाता दीपक शर्मा, पाली।

हरतालिका तीज का पर्व भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। यह व्रत मुख्य रूप से सुहागिन महिलाओं और कुंवारी कन्याओं के लिए विशेष महत्व रखता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार सुहागिन महिलाएं पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और अखंड सौभाग्य की कामना से यह व्रत रखती हैं, जबकि कुंवारी कन्याएं भगवान शिव के समान आदर्श जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए व्रत करती हैं।

कठिन व्रतों में शामिल है हरतालिका तीज

हरतालिका तीज को कठिन व्रतों में से एक माना जाता है। कई महिलाएं इस दिन 24 घंटे तक निर्जला व्रत रखती हैं। व्रत के दौरान अन्न और जल का त्याग कर महिलाएं भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा-अर्चना करती हैं। हालांकि निर्जला व्रत हर किसी के लिए आवश्यक नहीं है; स्वास्थ्य संबंधी परेशानी होने पर अपनी क्षमता और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार ही उपवास करना उचित है।

माता पार्वती की तपस्या से जुड़ी है पौराणिक कथा

पौराणिक कथा के अनुसार माता पार्वती ने हिमालय राज के घर जन्म लिया था और बचपन से ही भगवान शिव को पति के रूप में पाने की इच्छा रखती थीं। मान्यता है कि हिमालय राज ने उनका विवाह भगवान विष्णु से तय कर दिया था। इससे चिंतित पार्वती अपनी सखियों की सहायता से वन में चली गईं और भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या करने लगीं।

कहा जाता है कि सखियां उन्हें वहां ले गईं, इसलिए इस व्रत का नाम हरतालिका पड़ा। ‘हरत’ का अर्थ हरण करना और ‘आलिका’ का अर्थ सखी बताया गया है। माता पार्वती ने रेत से शिवलिंग बनाकर भगवान शिव की आराधना की। उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और पत्नी के रूप में स्वीकार किया। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह घटना भाद्रपद शुक्ल तृतीया से जुड़ी मानी जाती है।

शिव-पार्वती की पूजा कर सुहाग सामग्री अर्पित

हरतालिका तीज पर महिलाएं भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करती हैं। कई स्थानों पर रेत और मिट्टी से शिव-पार्वती की प्रतिमाएं बनाकर विधि-विधान से पूजा की जाती है। पूजा में सिंदूर, बिंदी, चूड़ी, मेहंदी सहित सुहाग की सामग्री अर्पित करने की परंपरा है।

रात में जागरण, भजन-कीर्तन और हरतालिका तीज व्रत कथा का श्रवण भी किया जाता है। कोरबा क्षेत्र सहित पाली अंचल में भी महिलाएं समूह में एकत्र होकर पूजा और व्रत कथा का आयोजन करती हैं।

प्रेम, संकल्प और समर्पण का प्रतीक

हरतालिका तीज केवल एक धार्मिक परंपरा ही नहीं, बल्कि संकल्प, प्रेम और समर्पण की भावना का प्रतीक भी मानी जाती है। माता पार्वती की तपस्या से जुड़ी यह कथा भारतीय पुरातन एवं सनातन संस्कृति में आस्था और समर्पण के महत्व को दर्शाती है।

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