ना कुछ मेरा, ना कुछ तेरा है,
फिर ये मन क्यों उलझा रहता है।
जब तक तन है, तब तक “मैं-मेरा” है,
तन मिटते ही न मेरा, न तेरा है।
व्यर्थ क्यों मन मोह में पड़ता है,
क्षण-क्षण क्यों यह भटकता रहता है?
तन के रहते तक ही यह फेरा है,
फिर न मेरा कुछ, न तेरा है।
जब तक साँस है, तब तक सवेरा है,
जीवन का हर पल अनमोल बसेरा है।
साँसों की डोर जो टूट जाती है,
फिर कहाँ मेरा और कहाँ तेरा है।
मन सदा इधर-उधर भटकता रहता है,
पाने-खोने के भँवर में फँसा रहता है।
इच्छाओं के पीछे दौड़ते-दौड़ते,
अपना ही चैन गँवाता रहता है।
तन इन्द्रियों के वश में रहता है,
मन उसे हर दिशा में ले जाता है।
जिसने मन पर संयम पा लिया,
जीवन का सार वही समझ पाता है।
जो अपने मन को वश में कर लेता है,
वही सदा सुख-शांति से रहता है।
मोह, ममता और अहं का बंधन छोड़,
आत्मानंद का अमृत पी लेता है।
ना कुछ लेकर आया था, ना कुछ लेकर जाएगा,
कर्म ही साथ चलेंगे, यही सत्य कहलाएगा।
तन पर कभी अभिमान न करना,
एक दिन सब कुछ जग में छोड़ जाना पड़ता है।
✍️: राजकुमार सोनी, नया रायपुर







