आषाढ़ शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि का हिन्दू धर्म में विशेष धार्मिक महत्व है। यह दिन “चौमासी चौदस” के रूप में भी जाना जाता है और यह चातुर्मास के आरंभ की पूर्व संध्या मानी जाती है। चातुर्मास यानी वर्षा ऋतु के चार महीने—आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद और आश्विन—जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं। ऐसे में सृष्टि संचालन की जिम्मेदारी भगवान शिव पर आ जाती है, इसलिए इस दिन शिव पूजन का विशेष महत्व होता है।
शिव पूजा का महत्व
आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशी को प्रदोष काल में भगवान शिव का पूजन अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है। इस दिन व्रत रखकर, रुद्राभिषेक और शिव मंत्रों का जाप करने से पापों का क्षय होता है और भक्त को मनोकामना पूर्ति का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस दिन व्रती को संयम, साधना और सात्त्विकता का पालन करना चाहिए।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण
यह तिथि आत्मचिंतन और आध्यात्मिक साधना के लिए भी उपयुक्त मानी जाती है। इस समय से साधक चातुर्मास व्रत, स्वाध्याय और सेवा जैसे संकल्प लेते हैं। यह समय स्वयं में झांकने और आत्मविकास का होता है।
व्रत विधि
– सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें
– व्रत का संकल्प लें
– दिन भर फलाहार करें
– संध्या के समय प्रदोष काल में शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा, चंदन आदि चढ़ाएं
– ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप करें
– शिव चालीसा या रुद्राष्टक का पाठ करें









