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“जहां सड़क डूब जाए… वहां पेड़ उगाने पड़ते हैं”

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विकास के तालाब में हरियाली का तड़का

रिपोर्ट: हारून रशीद

किरंदुल में आज खबर नहीं बनी…
एक खामोश तंज़ ज़मीन पर उग आया।

गौरव पथ — नाम सुनकर लगता है विकास सीना तानकर खड़ा होगा।
लेकिन हकीकत?
यहाँ सड़क नहीं, गड्ढों के तालाब हैं…
जहां गाड़ियाँ नहीं चलतीं, बल्कि हिचकोले खाती हैं।

और आज—
इन्हीं गड्ढों में पेड़ लगाए गए।

ये विरोध नहीं था… ये आईना था

कुछ लोग नारे लगाते हैं,
कुछ ज्ञापन देते हैं…
पर किरंदुल के पत्रकारों ने आज
मिट्टी में सवाल बो दिए।

जहां सड़क होनी चाहिए थी,
वहां पौधे उगाकर उन्होंने पूछ लिया—

“अगर ये सड़क नहीं… तो क्या इसे जंगल मान लें?”

यह प्रदर्शन नहीं,
एक शांत लेकिन चुभता हुआ व्यंग्य था।

12.5 करोड़ का सच… गड्ढों में डूबा

जिस सड़क पर करोड़ों खर्च हुए,
आज वही बस स्टैंड से रिंग रोड नंबर-4 तक
अपने ही वादों में धंस गई है।

गड्ढे इतने बड़े कि
बरसात का इंतजार नहीं करते—
खुद ही तालाब बन जाते हैं।

और सवाल ये नहीं कि गड्ढे क्यों हैं…
सवाल ये है कि
इतनी बड़ी खामोशी क्यों है?

जब पत्रकार मैदान में उतरते हैं…

इस बार खबर लिखी नहीं गई—
जी गई।

पत्रकार, जनप्रतिनिधि और स्थानीय लोग
एक साथ सड़क पर खड़े हुए।
हाथ में माइक नहीं…
पौधे थे।

और हर पौधा जैसे कह रहा था—

“अगर व्यवस्था सोएगी… तो हम जड़ें जमा लेंगे।”

ये सिर्फ पेड़ नहीं… एक संदेश है

एक तरफ हरियाली का प्रयास,
दूसरी तरफ व्यवस्था पर सवाल।

क्योंकि बात सिर्फ सड़क की नहीं है—
बात उस सोच की है
जहां विकास कागज पर चमकता है
और ज़मीन पर धंस जाता है।

अंतिम सवाल

अगर गड्ढों में पेड़ उग सकते हैं…
तो क्या जिम्मेदारी भी उग सकती है?

या फिर
हर खराब सड़क पर
हमें ऐसे ही जंगल बसाने पड़ेंगे?

हथौड़ा लाइन 

“जब सड़कें मर जाती हैं…
तो पत्रकार पेड़ लगाकर उन्हें जिंदा करने की कोशिश करते हैं।”

यह रिपोर्ट सिर्फ एक घटना नहीं—
एक तरीका है, जो बता रहा है कि
आवाज़ हमेशा शोर से नहीं… सोच से उठती है।

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