आज का दिन देश में भारतीय न्याय व्यवस्था के शुचिता के प्रकटीकरण का दिवस है क्योंकि आज से ठीक 51 साल पूर्व इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिंहा ने 12 जून 1975 को देश की सबसे ताकतवर आयरन लेडी तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को 1971 के रायबरेली लोकसभा चुनाव में भ्रष्ट आचरण और सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का दोषी पाकर रायबरेली से उनका चुनाव को शून्य घोषित कर दिया, जिसके परिणाम स्वरूप उन्हें प्रधानमंत्री पद छोड़ना पड़ा तथा जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत उन्हें अगले छह साल तक कोई भी चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया।
विदित हो कि यह ऐतिहासिक निर्णय उनके प्रतिद्वंद्वी राजनारायण द्वारा दायर चुनाव याचिका की सुनवाई उपरांत सुनाया गया था।
इस निर्णय के बाद फैसले के खिलाफ इंदिरा गांधी ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील किया जिस पर 24 जून 1975 को सुप्रीम कोर्ट ने सशर्त रोक (conditional stay) लगाई, जिसके तहत उन्हें प्रधानमंत्री पद पर बने रहने की अनुमति तो मिली, लेकिन संसद की कार्यवाही में मतदान करने से रोक दिया जिसके तत्काल बाद 25 जून 1975 को देश में आपातकाल (Emergency) की घोषणा कर दी गई और पूरा देश लंबे समय तक आपातकाल के यातनाओं से पीड़ित हुआ और 1977 के आम चुनाव में इमरजेंसी की दोषी कांग्रेस को जनता ने सत्ताच्युत कर दिया था।
आज भी भारतीय इतिहास में आपातकाल काले अक्षरों में अंकित है जिसमें एक लौह महिला कही जाने वाली सशक्त प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश की न्यायिक व्यवस्था को धता बताने का कुत्सित प्रयास किया जिसे भारतीय लोकतंत्र ने अपने लोकतांत्रिक अधिकार के जरिए उसके खिलाफ व्यापक जनादेश देकर जता दिया कि भारत एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य है जहां जनता जनार्दन सर्वोपरि है, जहां न्यायिक व्यवस्था की शुचिता जग जाहिर है और देशवासियों के लिए भारत एक भौगोलिक सीमा लिया हुआ सिर्फ गणराज्य नहीं है वरन हर देशवासी की माँ स्वरूप जन्मभूमि है जहां पर जननी जन्मभूमि स्वर्गादपि गरीयसी अर्थात माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी महान हैं, का भाव लोगों के रग रग में विराज मान है।
इसलिए हमारा हर संवाद का आगाज भारत माता की जय और वंदे मातरम के उद्घोष और गूंज से शुरु होता है…और आज भी भारत विश्व का सबसे बड़ा और सशक्त लोकतंत्र है।








