रायपुर संवाददाता – रघुराज
छत्तीसगढ़ विधानसभा सचिवालय में “सीधी भर्ती” शब्द इन दिनों एक ऐसा जादुई मुहावरा बन चुका है, जिसके सामने योग्यता, स्थापित प्रक्रिया और पारदर्शिता जैसे गंभीर शब्द खुद-ब-खुद छुट्टी पर चले जाते हैं। विधानसभा के गलियारों में चर्चा है कि इस एक शब्दावली की आड़ में न जाने कितनी ही नियुक्तियों को नियमसंगत ठहराने की कोशिशें की गईं और उन्हें वैधता का चोला पहनाने का प्रयास हुआ। बिना किसी शोर-शराबे और कड़े मापदंडों के चहेतों को कुर्सियों पर बैठाने का यह खेल अब खुलकर सामने आने लगा है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प और हैरान करने वाला मामला असिस्टेंट मार्शल और मार्शल की नियुक्तियों की उस बहुचर्चित सूची का है, जिसमें कुल आठ लोगों को जगह मिली थी। इस सूची को लेकर जब विवाद बढ़ा और मामला कानून के दरवाजे तक पहुंचा, तो न्याय के तराजू पर यह प्रक्रिया टिक नहीं सकी। उच्च न्यायालय के कड़े आदेश के बाद उस सूची के सात लोगों को बाहर का रास्ता देखना पड़ा। उनकी विदाई इस बात का प्रमाण थी कि भर्ती प्रक्रिया में कहीं न कहीं गंभीर खामियां थीं। लेकिन इस पूरी कहानी का सबसे अनोखा मोड़ यहीं से शुरू होता है। सात लोगों के बाहर होने के बाद भी एक तथाकथित कलाकार अब तक उसी मंच पर मजबूती से जमा हुआ है।
सहयोग और सत्ता के गठजोड़ का यह नजारा भी कम दिलचस्प नहीं है कि सात लोगों की नौकरी जाने के बाद भी सुरक्षित बचा रहा यह एक शख्स आजकल कांग्रेस पृष्ठभूमि से आने वाले एक कद्दावर मंत्री के ओएसडी यानी विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी के रूप में अपनी सेवाएं दे रहा है। जब पूरी की पूरी सूची ही अदालती जांच के दायरे में आकर बिखर गई, तब इस अकेले व्यक्ति का बचे रहना और फिर एक रसूखदार पद पर आसीन हो जाना सचिवालय के भीतर और बाहर कई तरह के अनसुलझे सवाल खड़े करता है। राजनीतिक हलकों में लोग इस संयोग को सिर्फ एक इत्तेफाक मानने को तैयार नहीं हैं।
इस पूरे मामले से जो सबसे बड़ा सबक निकलकर सामने आता है, वह यह है कि कुछ खास लोगों का भविष्य उनकी शैक्षणिक या व्यावहारिक योग्यताओं से तय नहीं होता। उनके लिए सफलता की राह किसी कठिन प्रतियोगिता परीक्षा या पारदर्शी चयन प्रक्रिया से होकर नहीं गुजरती, बल्कि उनके करियर का निर्धारण “सीधी भर्ती” और “सीधी पहुंच” के एक बेहद शक्तिशाली और साझा फार्मूले से होता है। जब तक यह संयुक्त फार्मूला काम करता रहता है, तब तक नियमों की धज्जियां उड़ती रहती हैं और योग्य उम्मीदवार कतारों में खड़े अपनी बारी का इंतजार करते रह जाते हैं।
विधानसभा सचिवालय जैसी गरिमामयी संस्था में इस तरह के प्रशासनिक प्रयोगों ने अब आम जनता और बेरोजगार युवाओं के बीच एक नकारात्मक संदेश दिया है। जहां एक तरफ प्रदेश के लाखों युवा दिन-रात मेहनत कर सरकारी नौकरियों के लिए पसीना बहा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ बैकडोर एंट्री और रसूख के दम पर मलाईदार पदों को हथियाने का यह सिलसिला व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर चोट करता है। कोर्ट के डंडे के बाद भी एक व्यक्ति का व्यवस्था में बने रहना यह साफ करता है कि जब तक पहुंच की जड़ें गहरी हों, तब तक नियम-कानून भी बेअसर साबित होते हैं।








