विमल सोनी –
हमारी संस्कृति और हमारी विरासत की सबसे खूबसूरत तस्वीर रतनपुर के ऐतिहासिक भगवान विट्ठलनाथ मंदिर में देखने को मिलती है। जहाँ आज भी परिवार की सातवीं पीढ़ी, अपने पूर्वजों द्वारा स्थापित 357 वर्ष पुरानी उत्सव परंपरा को अगाध श्रद्धा, भक्ति और पूर्ण विधि-विधान के साथ निभा रही है।
इतिहास के पन्नों से: एक दिव्य आगमन
संवत 1725 की बात है, जब इस मंदिर के संस्थापक काशीकर महराज जी चंद्रभागा नदी के तट से अपनी झोली में भगवान विट्ठल और माता रुक्मिणी के श्रीविग्रह (मूर्तियां) लेकर, भ्रमण करते हुए रतनपुर की पावन धरा पर पहुंचे थे। उन्होंने जब यहाँ भगवान विट्ठलनाथ के मंदिर की स्थापना की, तब शायद किसी ने यह कल्पना भी नहीं की होगी कि भविष्य में यह मंदिर धर्म, आस्था और सांस्कृतिक परंपराओं की एक महान त्रिवेणी बनेगा। उनके द्वारा स्थापित पूजा पद्धति, नारद का नगर भ्रमण, भजनों की स्वर-लहरियां और विशाल ‘दिंडी यात्रा’ आज भी उसी स्वरूप में जीवंत हैं।।
संस्कृति का अद्भुत संगम: मराठी परंपरा और छत्तीसगढ़ी हृदय
यह उल्लेख करना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि रतनपुर मूलतःछत्तीसगढ़ी भाषी लोगों की नगरी है, जबकि विट्ठलनाथ मंदिर की संपूर्ण पूजा-पद्धति और परंपराएं पूर्णतः मराठी भाषा में संपन्न होती हैं। लेकिन, जब उत्सव शुरू होता है, तो देखने और सुनने वाले को यह आभास ही नहीं होता कि दोनों संस्कृतियों में कोई भेद है। छत्तीसगढ़ी परंपरा को मानने वाले नगरवासी इतने सुव्यवस्थित और सुंदर ढंग से, भगवान की सारी व्यवस्थाओं को मराठी भाषा में ही आत्मसात कर लेते हैं। इसका पूरा श्रेय मंदिर प्रबंधन को जाता है, जिन्होंने पूरे रतनपुर नगर को अपना परिवार माना है और दिलों को जोड़ा है।
भक्ति से गूंजता सभामंडप
यहाँ का मुख्य उत्सव वर्ष में दो बार— आषाढ़ और कार्तिक मास में संपन्न होता है। कार्तिक मास में यह उत्सव लगभग एक मास तक अनवरत चलता है। प्रातःकाल की प्रभाती (भोर के भजन) से लेकर भगवान के विभिन्न चरित्रों का गायन के माध्यम से अद्भुत वर्णन किया जाता है। जब मंदिर के गायक और वादक संत एकनाथ, संत तुकाराम, संत नरहरि, संत मीराबाई, जनाबाई, मुक्ताबाई और संत नामदेव के अभंग व भजनों की प्रस्तुति देते हैं, तो पूरा सभामंडप “जय-जय राम कृष्ण हरि” और विट्ठल-विट्ठल के जयघोष से गूंज उठता है।
स्मृतियों में जीवित विट्ठल नाथ के अनन्य भक्त (भावपूर्ण श्रद्धांजलि)
भगवान विट्ठलनाथ के उन अनन्य भक्तों का स्मरण करना यहाँ अत्यंत आवश्यक है, जो आज यद्यपि भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन मंदिर के प्रति उनका समर्पण और भावनाएं अमर हैं।
इन पुण्य आत्माओं में स्व. रामगुलाम वैद्य, नाथूराम थवाइत, लखन लाल सोनी मुनीम, बलदेव प्रसाद शर्मा,भंगी महाराज, कपिल नाथ शास्त्री, अर्जुन गोपाल, श्याम जी थवाइत, ईश्वर गिरी गोस्वामी, बद्री विशाल गुप्ता, बालाजी गुप्ता, केशव राव पांडे, छेदीलाल गुप्ता, ओंकार नाथ गुप्ता, टीकाराम बैसवाड़े, आल्हा यादव, कौशल प्रसाद सोनी, मोतीलाल सोनी, उद्धव प्रसाद गुप्ता, दामोदर सोनी, लाला महाराज भगवत प्रसाद तिवारी और नरेंद्रनाथ शर्मा जैसे अनेक नाम शामिल हैं। मंदिर की परंपरा को आगे बढ़ाने में इनकी भूमिका अद्वितीय रही है और इनका योगदान चिरस्थाई रहेगा।
उत्सव की रूपरेखा और आगामी कार्यक्रम
आषाढ़ मास: आषाढ़ शुक्ल दशमी को पूर्ण विधि-विधान से घट स्थापना होती है। देवशयनी एकादशी के दिन भक्तगण भजन-कीर्तन करते हुए ‘दिंडी यात्रा’ में शामिल होते हैं। यह यात्रा नगर के प्रमुख मंदिरों में जाती है और भजनों के माध्यम से भगवान को शयन कराया जाता है।
कार्तिक मास: कार्तिक एकादशी को यही दिंडी यात्रा भगवान को निद्रा से जगाने के लिए मंदिर-मंदिर भ्रमण करती है।
प्रवचन एवं बाल लीला: द्वादशी से चतुर्दशी तक इंदौर से पधारे सुप्रसिद्ध कीर्तनकार पं. एवज भंडारे जी का संगीतमय प्रवचन संपन्न होगा। तत्पश्चात पूर्णिमा के दिन ‘गोपालकाला’ का भव्य आयोजन होगा, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण की विभिन्न बाल लीलाओं की मनोरम प्रस्तुति दी जाएगी।
परंपरा के संवाहक: कल और आज
पंढरपुर में भगवान विट्ठल-रुक्माई के लिए जो भाव और भक्ति अर्पित की जाती है, ठीक वही आस्था की गंगा रतनपुर में भी बहती है। इस पूरी व्यवस्था और परंपरा को पहले पुंडरिक राव नगरकर और उनके सुपुत्र पं. रामचंद्र पुंडरिक राव नगरकर एवं प्रभाकर पुंडरिक राव नगरकर (बाबाकाका) ने निष्ठापूर्वक निभाया।
वर्तमान प्रबंधन एवं सहयोगी:
आज इस पावन जिम्मेदारी को सातवीं पीढ़ी के रूप में मंदिर के प्रबंधक एवं पुजारी, पं. आनंद नगरकर – सौ. रंजना नगरकर, और पं. अनिरुद्ध नगरकर – सौ. शिल्पा नगरकर संभाल रहे हैं।
परिवार के सदस्य पं. अन्वेष वैद्य, अनन्य वैद्य, पं. अनय एवं पं. आराध्य नगरकर भी इसमें अपना पूर्ण सहयोग दे रहे हैं। इसके अतिरिक्त, नगर के प्रतिष्ठित व्यक्तियों— पंडित रामकुमार तिवारी, किशन लाल तंबोली, कृष्णा महराज,मानिक लाल कश्यप, मन्नू लाल सोनी, अनिल चंदेल,संतोष गुप्ता, सोमेश्वर गिरी गोस्वामी, विद्याभूषण तिवारी, मनहरण लाल शर्मा, अनिल शर्मा, संतोष यादव, पवन विश्वकर्मा, दीपक महाराज,सुरेश कुमार गुप्ता, संतोष गुप्ता, उदल यादव, बल्दाऊ गुप्ता, बल्दाऊ सोनी, अशोक, गुप्ता, खीखराम कश्यप, उपेंद्र गोपाल, बल्दाऊ गोपाल,मुकेश गुप्ता, पिंटू गुप्ता,मुकेश जोशी सहित समस्त नगरवासियों के आत्मीय सहयोग से यह महोत्सव प्रतिवर्ष निर्विघ्न संपन्न होता है।.







