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शासनादेश के बाद भी प्रभार का विवाद: DIET जांजगीर में आखिर किसके इशारे पर चल रही व्यवस्था?

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-प्रतिनियुक्ति समाप्त होने के बाद भी प्रभारी प्राचार्य के रूप में कार्य करने के आरोप, वित्तीय प्रभार और वेतन व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल

राजेन्द्र जायसवाल/जिला जांजगीर चांपा जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (DIET) जांजगीर में प्रभारी प्राचार्य की भूमिका को लेकर उठ रहा विवाद अब केवल एक अधिकारी-कर्मचारी के बीच का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह शासन के आदेशों के पालन, प्रशासनिक जवाबदेही और संस्थागत व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। आरोप है कि शासन द्वारा 11 जून 2026 को भुनेश्वर प्रसाद साहू की प्रतिनियुक्ति समाप्त कर उन्हें शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय पौड़ी दलहा में प्राचार्य के रूप में पदस्थ किए जाने के बावजूद वे लंबे समय तक DIET जांजगीर में प्रभारी प्राचार्य की भूमिका में बने रहे।

यदि सामने रखे जा रहे दस्तावेज और आरोप सही पाए जाते हैं, तो सवाल यह है कि शासन का आदेश लागू कराने की जिम्मेदारी जिन अधिकारियों की थी, उन्होंने समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की?

प्रतिनियुक्ति समाप्त, फिर भी पुराना प्रभार कैसे?
बताया जा रहा है कि 11 जून 2026 को जारी शासन आदेश के बाद भुनेश्वर प्रसाद साहू को DIET जांजगीर से कार्यमुक्त होकर नई पदस्थापना स्थल पर जाना था। आरोप है कि इसके बजाय वे 16 जून से अवकाश पर चले गए और संस्था में अपनी पूर्व भूमिका को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं की गई।
सबसे गंभीर आरोप वित्तीय कार्यों से जुड़ा है। आरोप है कि 16 से 19 जून के बीच अवकाश में रहते हुए भी DIET के वित्तीय कार्य उनके द्वारा घर से किए गए तथा चेक जारी किए गए। यदि ऐसा हुआ है तो इसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है कि उस अवधि में वित्तीय अधिकार किसके पास थे, किस प्राधिकरण के आधार पर चेक जारी हुए और संबंधित अभिलेखों पर किसके हस्ताक्षर हैं।

94 दिन के अवकाश और स्वीकृति पर भी सवाल
मामले में यह भी दावा किया जा रहा है कि लंबे अंतराल के बाद संस्था में वापसी करने के पश्चात उनके 94 दिनों के लघुकृत अवकाश को स्वीकृति दी गई। यहां भी विभागीय नियमों के पालन और सक्षम अधिकारी की भूमिका की जांच जरूरी है।

विशेष रूप से यह स्पष्ट होना चाहिए कि अवकाश आवेदन किस कार्यालय को प्रस्तुत किया गया था, उसे स्वीकृत करने का अधिकार किस अधिकारी के पास था तथा क्या संबंधित कर्मचारी उस अवधि में वास्तव में DIET की प्रशासनिक जिम्मेदारियों का निर्वहन कर रहे थे।

वित्तीय प्रभार नहीं सौंपने से कर्मचारियों को वेतन के लिए करना पड़ा इंतजार?
विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू संस्था की वित्तीय व्यवस्था से जुड़ा बताया जा रहा है। आरोप है कि लंबे समय तक वित्तीय प्रभार अथवा DDO संबंधी अधिकार किसी अन्य सक्षम अधिकारी को नहीं सौंपे गए, जिसके कारण संस्था के कर्मचारियों को जुलाई माह का वेतन 7 अगस्त को प्राप्त हुआ।

यदि वित्तीय प्रभार उपलब्ध न होने के कारण वेतन भुगतान में विलंब हुआ है, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि कर्मचारियों के हितों से जुड़ा गंभीर विषय है। शासन को यह जांचना चाहिए कि वेतन भुगतान में देरी का वास्तविक कारण क्या था और इसके लिए जिम्मेदारी किसकी बनती है।

3 अगस्त की उपस्थिति और हस्ताक्षर पर भी उठे प्रश्न

आरोप यह भी है कि भुनेश्वर प्रसाद साहू ने 3 अगस्त 2026 को DIET में कार्यभार ग्रहण करने संबंधी कार्रवाई की, जबकि संस्था के कुछ कर्मचारियों के अनुसार उस दिन वे कार्यालय में उपस्थित नहीं थे। यदि यह दावा सही है तो उपस्थिति पंजिका, कार्यभार ग्रहण पत्र, जावक पंजी, CCTV फुटेज और संबंधित दस्तावेजों की जांच से स्थिति स्वतः स्पष्ट हो सकती है।
ऐसे मामलों में आरोप-प्रत्यारोप से अधिक महत्वपूर्ण है कि रिकॉर्ड की जांच कर वास्तविक तथ्य जनता के सामने रखे जाएं।

‘प्रभारी प्राचार्य’ की भूमिका को लेकर मूल सवाल
पूरे विवाद का सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि शासन द्वारा /प्रतिनियुक्ति समाप्त किए जाने के बाद भुनेश्वर प्रसाद साहू की DIET में वास्तविक प्रशासनिक स्थिति क्या थी?
यदि वे प्रतिनियुक्ति समाप्त होने के बाद सहायक प्राध्यापक के पद पर वापस आ चुके थे, तो उन्हें प्रभारी प्राचार्य के अधिकार किस आदेश के तहत प्राप्त थे? यदि कोई लिखित आदेश था तो वह सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया? और यदि कोई लिखित आदेश नहीं था तो उनके द्वारा प्रभारी प्राचार्य की सील, हस्ताक्षर अथवा प्रशासनिक आदेश जारी किए जाने का आधार क्या था?

यह प्रश्न केवल भुनेश्वर प्रसाद साहू से नहीं, बल्कि उन सभी अधिकारियों से पूछा जाना चाहिए जिनके संज्ञान में यह स्थिति होने के बावजूद कार्रवाई नहीं हुई।

जिला शिक्षा अधिकारी की भूमिका पर भी सवाल

इस मामले में जिला शिक्षा अधिकारी अशोक सिन्हा की भूमिका पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। आरोप है कि उच्च अधिकारियों द्वारा कार्यमुक्त करने के निर्देश दिए जाने की बात सामने आने के बावजूद कार्रवाई में विलंब हुआ।
यदि कलेक्टर स्तर से कार्यमुक्त करने का निर्देश दिया गया था, तो उसकी लिखित प्रति, आदेश की तारीख और अनुपालन की स्थिति सार्वजनिक की जानी चाहिए। वहीं यदि जिला शिक्षा अधिकारी का मत था कि दोनों अधिकारी समकक्ष हैं और इसलिए कार्यमुक्त नहीं किया जा सकता, तो इस संबंध में विभागीय नियम और सक्षम प्राधिकारी का स्पष्ट आदेश सामने आना चाहिए।

शासनादेश की व्याख्या मौखिक बातचीत से नहीं, लिखित नियम और आदेश से होनी चाहिए।
उपप्राचार्य की भूमिका भी जांच के दायरे में आए

उपप्राचार्य एल.के. पाण्डेय की भूमिका को लेकर भी आरोप लगाए गए हैं कि उन्होंने भुनेश्वर प्रसाद साहू को कार्यमुक्त नहीं किया। दूसरी ओर यह तर्क सामने आने की बात कही जा रही है कि वे प्रभारी प्राचार्य हैं और इसलिए उन्हें कार्यमुक्त नहीं किया जा सकता।

इस पूरे मामले में विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि 11 जून के आदेश के बाद DIET में प्रभारी प्राचार्य की वैधानिक स्थिति क्या थी और किस अधिकारी को कार्यमुक्त करने का अधिकार प्राप्त था।
अपर कलेक्टर के कथित बयान पर भी विभाग को स्पष्ट करना चाहिए स्थिति
मामले में अपर कलेक्टर शिव चौधरी के नाम से यह बात सामने आ रही है कि जब तक नियमित प्राचार्य नहीं आता, तब तक भुनेश्वर प्रसाद साहू प्रभारी प्राचार्य के रूप में कार्य कर सकते हैं।

यदि ऐसा कोई प्रशासनिक मत या आदेश वास्तव में दिया गया है, तो उसे लिखित रूप में स्पष्ट किया जाना चाहिए। क्योंकि सरकारी संस्थान में किसी व्यक्ति की प्रशासनिक शक्तियां केवल मौखिक सहमति से निर्धारित नहीं हो सकतीं। कौन प्राचार्य है, कौन प्रभारी है और किसके पास वित्तीय एवं प्रशासनिक अधिकार हैं—इसका स्पष्ट लिखित रिकॉर्ड होना आवश्यक है।

हाईकोर्ट की कार्यवाही के बाद भी स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं
यह भी दावा किया जा रहा है कि भुनेश्वर प्रसाद साहू ने अपनी प्रतिनियुक्ति समाप्त किए जाने के शासन आदेश को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था और उनकी याचिका खारिज हो गई*
यदि न्यायालय का आदेश उपलब्ध है, तो उसकी प्रमाणित प्रति तथा वर्तमान पदस्थापना की स्थिति के आधार पर विभाग को तत्काल यह स्पष्ट करना चाहिए कि उनकी वर्तमान वैधानिक स्थिति क्या है।
दूसरे कर्मचारियों के लिए अलग और साहू के लिए अलग नियम?

मामले में एक कर्मचारी सुरेश प्रसाद साहू के स्थानांतरण और कार्यमुक्ति का उदाहरण भी सामने रखा जा रहा है। आरोप है कि स्थानांतरण आदेश में नाम संबंधी त्रुटि होने के बावजूद उन्हें तत्काल कार्यमुक्त कर दिया गया, जबकि भुनेश्वर प्रसाद साहू के मामले में लंबे समय से कार्यमुक्ति की प्रक्रिया लंबित है।

यदि दोनों मामलों में परिस्थितियां समान थीं, तो अलग-अलग प्रशासनिक व्यवहार का कारण भी स्पष्ट किया जाना चाहिए।

क्या विभागीय नियम व्यक्ति देखकर बदलते हैं?
यही वह सवाल है जिसका जवाब DIET जांजगीर ही नहीं, बल्कि पूरा शिक्षा विभाग चाहता है।
जांच प्रतिवेदन को लेकर भी उठी विश्वसनीयता की चुनौती
भुनेश्वर प्रसाद साहू से संबंधित पूर्व जांच प्रतिवेदन को लेकर भी आरोप लगाए जा रहे हैं कि कथित रूप से एक ऐसा प्रतिवेदन प्रसारित किया जा रहा है जिसकी प्रामाणिकता संदिग्ध है।
यह अत्यंत गंभीर विषय है। यदि कोई जांच प्रतिवेदन वास्तव में विभाग द्वारा जारी किया गया है तो उसका पत्र क्रमांक, दिनांक, सक्षम अधिकारी के हस्ताक्षर और कार्यालय रिकॉर्ड आसानी से सत्यापित किया जा सकता है। वहीं यदि दस्तावेज फर्जी है तो उसे प्रसारित करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
जांच रिपोर्ट सही है या फर्जी—इसका फैसला आरोपों से नहीं, मूल सरकारी रिकॉर्ड से होना चाहिए।*
अब प्रशासन के सामने सिर्फ
एक रास्ता—निष्पक्ष जांच DIET जांजगीर का यह विवाद अब इतने सवाल खड़े कर चुका है कि इसे केवल मौखिक निर्देशों और आश्वासनों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।

शासन को चाहिए कि पूरे मामले की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच कराई जाए

जांच में विशेष रूप से इन बिंदुओं की जांच हो—

11 जून 2026 के शासन आदेश के बाद भुनेश्वर प्रसाद साहू की वास्तविक पदस्थापना और कार्यमुक्ति की स्थिति।

16 जून से 19 जून के बीच किए गए कथित वित्तीय कार्य और जारी चेक।

94 दिनों के अवकाश की स्वीकृति और सक्षम अधिकारी का अधिकार।

DDO/वित्तीय प्रभार किसके पास था और क्यों नहीं सौंपा गया।

कर्मचारियों के वेतन भुगतान में देरी का वास्तविक कारण।
3 अगस्त की कथित उपस्थिति और हस्ताक्षर की सत्यता।

प्रभारी प्राचार्य की सील एवं हस्ताक्षर से जारी आदेशों की वैधानिकता।

जावक पंजी में दर्ज कार्यभार ग्रहण संबंधी प्रविष्टियों की सत्यता।

जिला शिक्षा अधिकारी, उपप्राचार्य एवं अन्य संबंधित अधिकारियों की भूमिका।
हाईकोर्ट के आदेश के बाद विभाग द्वारा की गई कार्रवाई।
कथित जांच प्रतिवेदन की प्रामाणिकता।

सवाल बड़ा है—व्यक्ति का नहीं, व्यवस्था के भरोसे का

सरकारी संस्थान किसी व्यक्ति की निजी जागीर नहीं होते। वहां पद, अधिकार और जिम्मेदारियां शासन के आदेशों तथा नियमों से तय होती हैं। यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी को शासन के आदेश के बावजूद लंबे समय तक किसी पद का अधिकार प्राप्त रहा, तो यह सिर्फ उस व्यक्ति का मामला नहीं है—यह उस पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की जवाबदेही का विषय है जिसने उसे ऐसा करने दिया।

इसलिए अब समय आ गया है कि कलेक्टर, जिला शिक्षा अधिकारी और संबंधित उच्चाधिकारी आरोपों की निष्पक्ष जांच कर वास्तविक स्थिति सार्वजनिक करें।

यदि भुनेश्वर प्रसाद साहू के विरुद्ध लगाए गए आरोप गलत हैं तो उन्हें तत्काल क्लीन चिट देकर तथ्य सार्वजनिक किए जाएं, और यदि आरोप जांच में सही पाए जाते हैं तो जिम्मेदार अधिकारियों-कर्मचारियों के विरुद्ध नियमानुसार कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।

शासन का आदेश सर्वोपरि है। किसी भी सरकारी संस्थान में व्यक्ति नहीं, नियम चलना चाहिए।
जांजगीर की जनता और DIET के कर्मचारी अब यही जानना चाहते हैं—आखिर शासन का आदेश बड़ा है या किसी व्यक्ति का प्रभाव?
यह सवाल अब केवल DIET जांजगीर का नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन की विश्वसनीयता और कानून के राज का सवाल बन चुका है।

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