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100 से अधिक रोजगार पात्रों का दावा, आधार क्या..? सीएमडीसी-ठेकेदार की चुप्पी पर उठे सवाल

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संवाददाता युसूफ खान
कुसमी बलरामपुर
जमीरापाठ में रोजगार को लेकर नया विवाद; भूमि प्रभावित पूर्व उपसरपंच प्रमोद गुप्ता ने 80 से अधिक लोगों को बताया काम के योग्य, एसडीएम ने दोनों पक्षों की जांच कर वास्तविक हकदार तय करने की कही बात
कुसमी। बलरामपुर – रामानुजगंज जिला के अनुविभाग कुसमी अंतर्गत ग्राम पंचायत जमीरापाठ में सीएमडीसी की बॉक्साइट परियोजना में रोजगार को लेकर चल रहा विवाद अब एक महत्वपूर्ण सवाल पर आकर टिक गया है – आखिर भूमि प्रभावितों की ओर से 80 से 100 से अधिक लोगों के रोजगार योग्य होने का दावा किस आधार पर किया जा रहा है..? स्थानीय बेरोजगार युवाओं द्वारा रोजगार में प्राथमिकता की मांग के बाद अब भूमि प्रभावितों का पक्ष सामने आया है। गुरुवार को भूमि प्रभावित पक्ष ने अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) कुसमी अनमोल विवेक टोप्पो को ज्ञापन सौंपकर पहले भूमि प्रभावित परिवारों के पात्र सदस्यों को उनकी योग्यता के अनुसार रोजगार देने की मांग की।
ज्ञापन लेने के बाद एसडीएम अनमोल विवेक टोप्पो ने कहा कि जमीरापाठ में हो रही माइनिंग के संबंध में पूर्व में भी एक पक्ष द्वारा ज्ञापन दिया गया था। उसमें कुछ ऐसे युवाओं ने रोजगार नहीं मिलने की बात कही थी, जो योग्यता रखते हैं। अब दूसरा पक्ष भी अपना पक्ष लेकर आया है। इस पक्ष का कहना है कि जिन भूमि स्वामियों ने माइनिंग के लिए अपनी भूमि दी है, उन्हें रोजगार मिला हुआ है और माइनिंग का कार्य जारी रहना चाहिए।
एसडीएम ने स्पष्ट किया कि दोनों पक्षों के दावों और तथ्यों की पूरी समीक्षा की जाएगी। दोनों पक्षों को सुनने के बाद संबंधित लोगों की योग्यता और वास्तविक हकदारी के आधार पर रोजगार को लेकर आवश्यक निर्देश दिए जाएंगे।
 
30-32 खातेदार, लेकिन 100 रोजगार पात्र होने का दावा..
भूमि प्रभावित पक्ष की ओर से ज्ञापन सौंपने पहुंचे ग्राम जमीरापाठ के पूर्व उपसरपंच एवं भूमि प्रभावित प्रमोद गुप्ता ने मीडिया के सामने कहा कि उनका किसी से विवाद नहीं है। उनकी मांग है कि माइनिंग के लिए जमीन देने वाले सभी भूमि प्रभावितों को पहले रोजगार मिले।
प्रमोद गुप्ता के अनुसार वर्तमान में करीब 30 से 32 जमीन हितग्राही हैं, लेकिन जमीन का बंटवारा करीब तीन पीढ़ियों से नहीं हुआ है। उनका दावा है कि बंटवारा होने पर परिवार के सदस्यों की संख्या बढ़कर करीब 100 तक पहुंच जाती है। उन्होंने कहा कि अधिकांश भूमि प्रभावितों को मुआवजा मिल चुका है और अब मांग है कि परिवार के सदस्यों को उनकी योग्यता के अनुसार रोजगार दिया जाए।
यहीं से सबसे बड़ा सवाल सामने आता है कि वर्तमान राजस्व रिकॉर्ड में 30-32 भूमि हितग्राही होने की स्थिति में रोजगार के लिए करीब 100 लोगों की पात्रता किस दस्तावेज, वंशावली अथवा राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर तय की जा रही है..?
क्या भविष्य में संभावित भूमि बंटवारे से बनने वाले हिस्सेदारों को वर्तमान रोजगार पात्रता में शामिल किया जा सकता है? यदि किसी एक खाते में पांच हिस्सेदार हैं तो क्या सभी हिस्सेदार रोजगार के पात्र होंगे? और यदि एक खातेदार के परिवार में कई सदस्य हैं तो उनमें से कितने लोगों को रोजगार का अधिकार मिलेगा? इन सवालों का स्पष्ट जवाब अभी सामने नहीं आया है।
80 पद और उससे अधिक दावेदार, मामला कैसे सुलझेगा..?
प्रमोद गुप्ता ने यह भी कहा कि सीएमडीसी की ओर से शुरुआती स्तर पर करीब 80 लोगों को काम में रखने की बात कही गई है। उनका दावा है कि माइनिंग क्षेत्र में वर्तमान में ही भूमि प्रभावित परिवारों में काम करने योग्य लोगों की संख्या 80 से अधिक हो रही है।
यदि परियोजना के शुरुआती चरण में रोजगार के अवसर करीब 80 लोगों तक सीमित हैं और भूमि प्रभावित पक्ष इससे अधिक लोगों को रोजगार योग्य बता रहा है, तो रोजगार के वास्तविक मापदंड और चयन प्रक्रिया का स्पष्ट होना बेहद जरूरी हो जाता है।
प्रमोद गुप्ता का कहना है कि भूमि प्रभावितों में पढ़े-लिखे लोगों के साथ माइनिंग कार्य करने योग्य लोग भी हैं। इसलिए पहले भूमि प्रभावितों को उनकी योग्यता के अनुसार रोजगार मिलना चाहिए। परियोजना का बीट बढ़ने के साथ अन्य स्थानीय बेरोजगार युवाओं को भी रोजगार दिलाने के लिए सीएमडीसी से मांग करने की बात उन्होंने कही।
55 लोगों के नाम ए-फॉर्म में दर्ज होने का दावा..
प्रमोद गुप्ता ने बताया कि करीब 55 लोगों के नाम ए-फॉर्म में सरपंच एवं जनप्रतिनिधियों के समक्ष दर्ज कराए जा चुके हैं। जिन भूमि स्वामियों को अभी मुआवजा नहीं मिला है, उनका मुआवजा मिलने के बाद भर्ती प्रक्रिया में शामिल किए जाने की बात भी उन्होंने कही । उन्होंने सीएमडीसी द्वारा पहले से रोजगार दिए गए लोगों को पात्र बताते हुए कहा कि उनकी ओर से बाहरी लोगों को रोजगार दिए जाने को लेकर आपत्ति नहीं है। उनका कहना है कि फिलहाल भूमि प्रभावितों को उनकी योग्यता के आधार पर रोजगार दिया जाना प्राथमिकता होनी चाहिए।
हालांकि यहां भी यह सवाल बना हुआ है कि 55 लोगों की सूची किस आधार पर तैयार हुई है और उसमें शामिल प्रत्येक व्यक्ति की भूमि हिस्सेदारी, वंशावली तथा रोजगार पात्रता का सत्यापन किस स्तर पर हुआ है..?
सीएमडीसी और तेजस कार्गो की चुप्पी क्यों..?
इस पूरे विवाद में सीएमडीसी तथा परियोजना से जुड़े ठेकेदार तेजस कार्गो इंडिया लिमिटेड की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। भूमि प्रभावित पक्ष की ओर से 80 से 100 से अधिक लोगों को रोजगार योग्य बताए जाने के बावजूद अभी तक यह स्पष्ट रूप से सामने नहीं आया है कि परियोजना प्रबंधन के आधिकारिक रिकॉर्ड में भूमि प्रभावितों की संख्या कितनी है, रोजगार के लिए कितने पद उपलब्ध हैं और पात्रता निर्धारित करने का आधार क्या है। क्या सीएमडीसी के पास भूमि प्रभावितों की प्रमाणित सूची उपलब्ध है? क्या तेजस कार्गो को रोजगार के लिए किसी निर्धारित सूची के आधार पर लोगों का चयन करने की जिम्मेदारी दी गई है? यदि हां, तो वह सूची किसने तैयार की है? क्या उसमें राजस्व रिकॉर्ड और वंशावली का सत्यापन किया गया है..?
इन सवालों पर सीएमडीसी और तेजस कार्गो इंडिया लिमिटेड की आधिकारिक स्थिति सामने आना जरूरी है। क्योंकि एक ओर भूमि प्रभावित पक्ष 80 से अधिक लोगों को काम के योग्य बता रहा है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय बेरोजगार युवा भी रोजगार के अधिकार का दावा कर रहे हैं।
क्या किसी एक पक्ष को ही दी गई है जिम्मेदारी..?
रोजगार प्रक्रिया को लेकर एक और सवाल स्थानीय स्तर पर चर्चा में है। यदि भूमि प्रभावितों की ओर से रोजगार के लिए 55 नामों की सूची तैयार की गई है और 80 से 100 से अधिक लोगों को रोजगार योग्य बताया जा रहा है तो क्या यह सूची केवल भूमि प्रभावित पक्ष की पहल पर तैयार हुई है या इसे सीएमडीसी और ठेकेदार की ओर से भी अधिकृत अथवा सत्यापित किया गया है?
क्या सीएमडीसी के ठेकेदार की ओर से रोजगार संबंधी स्थानीय स्तर की जवाबदेही किसी व्यक्ति या पक्ष को अनौपचारिक रूप से सौंप दी गई है..? यदि ऐसा है तो इसकी आधिकारिक प्रक्रिया क्या है? और यदि ऐसा नहीं है तो रोजगार से जुड़े दावे और सूचियां किस आधार पर सामने आ रही हैं..? फिलहाल यह केवल सवाल है, जिसका उत्तर संबंधित कंपनी और ठेकेदार की आधिकारिक प्रतिक्रिया तथा प्रशासनिक जांच से ही स्पष्ट हो सकेगा। बिना दस्तावेजी सत्यापन किसी व्यक्ति के दावे को अंतिम पात्रता मानना उचित नहीं होगा।
पूर्व बीडीसी ने भी भूमि प्रभावितों को प्राथमिकता देने की मांग रखी
ग्राम जमीरापाठ के पूर्व बीडीसी खसरु राम बुनकर ने कहा कि वे सीएमडीसी की खदान खुलने के पूर्व से ही कंपनी से भूमि प्रभावितों को प्राथमिकता देने की मांग करते रहे हैं। उनके अनुसार एक खाते में पांच-पांच हिस्सेदार होने की स्थिति में उन सभी पात्र हिस्सेदारों को भी रोजगार उपलब्ध कराया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि पहले भूमि प्रभावित परिवारों के पात्र लोगों को रोजगार दिया जाए और परियोजना का विस्तार होने के साथ अन्य स्थानीय युवाओं को भी रोजगार उपलब्ध कराया जाए। उन्होंने बताया कि एसडीएम की ओर से मामले की जांच और समीक्षा का आश्वासन मिला है तथा गांव में भाईचारा बनाए रखने की बात कही गई है। उन्होंने यह भी कहा कि पहले रोजगार की मांग को लेकर आए युवाओं की मांग भी जायज है। वहीं उन्होंने राजस्व ग्राम डूमरपाठ के लोगों के साथ उपेक्षा और सौतेला व्यवहार किए जाने का आरोप लगाया। उनके अनुसार इसी मुद्दे को लेकर डूमरपाठ के सरपंच, बीडीसी, जनप्रतिनिधि और रोजगार की मांग करने वाले युवा भी बड़ी संख्या में एसडीएम कार्यालय पहुंचे।
राजस्व रिकॉर्ड बताएगा असली तस्वीर..
अब पूरा मामला दावों से निकलकर दस्तावेजी जांच की ओर बढ़ गया है। भूमि प्रभावित पक्ष द्वारा एक ही खाते में कई हिस्सेदार और परिवार में 100 तक संभावित रोजगार पात्र लोगों का दावा किया गया है। लेकिन इस दावे की वास्तविकता राजस्व अभिलेख, वंशावली, भूमि स्वामित्व, वैध हिस्सेदारी, मुआवजा रिकॉर्ड और संबंधित व्यक्तियों की योग्यता के सत्यापन के बाद ही स्पष्ट होगी।
सबसे महत्वपूर्ण यह भी है कि भूमि का भविष्य में होने वाला संभावित बंटवारा और वर्तमान में राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज वैध हिस्सेदारी—इन दोनों को रोजगार पात्रता के लिए किस प्रकार देखा जाएगा। इसका निर्धारण प्रशासन और परियोजना से जुड़े नियमों के आधार पर होना होगा।
अब एसडीएम की जांच पर टिकी नजर..
ज्ञापन के बाद एसडीएम अनमोल विवेक टोप्पो ने दोनों पक्षों को सुनकर वास्तविक हकदारों और उनकी योग्यता के आधार पर रोजगार देने की बात कही है। ऐसे में अब प्रशासन की जांच महत्वपूर्ण हो गई है। प्रशासन को यह स्पष्ट करना होगा कि वर्तमान में कितने भूमि प्रभावित हैं, उनमें कितने वैध हिस्सेदार हैं, एक खाते में कितने पात्र सदस्य हो सकते हैं, कितने लोगों के दस्तावेज सत्यापित हैं और परियोजना में वर्तमान में कुल कितने रोजगार उपलब्ध हैं।
साथ ही सीएमडीसी और तेजस कार्गो इंडिया लिमिटेड की ओर से भी परियोजना की रोजगार नीति, उपलब्ध पदों, चयन प्रक्रिया और भूमि प्रभावितों की आधिकारिक सूची को लेकर स्थिति स्पष्ट किए जाने की जरूरत है। जमीरापाठ के रोजगार विवाद में अब असली सवाल यह नहीं रह गया है कि किसे नौकरी मिलनी चाहिए, बल्कि यह है कि नौकरी के लिए पात्रता तय करने का आधिकारिक आधार क्या है। भूमि प्रभावित पक्ष के 80 से 100 लोगों के दावे और स्थानीय बेरोजगार युवाओं की मांग के बीच राजस्व रिकॉर्ड, प्रमाणित वंशावली और सीएमडीसी की आधिकारिक सूची ही तय करेगी कि वास्तविक हकदार कौन हैं।
जब तक इन दस्तावेजों की जांच पूरी नहीं होती, तब तक किसी भी पक्ष के दावे को अंतिम सत्य मानना उचित नहीं होगा। अब देखना होगा कि एसडीएम की समीक्षा के बाद प्रशासन इस पूरे मामले में कितनी पारदर्शी प्रक्रिया अपनाता है और सीएमडीसी व तेजस कार्गो की ओर से रोजगार के मुद्दे पर क्या आधिकारिक जवाब सामने आता है। फिलहाल दोनों सम्पर्क से बाहर हो चुके हैं।

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