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रायगढ़ कथक की विरासत में डॉ. बलदेव की अनदेखी कहानी: शोध, लेखकत्व विवाद और ‘रायगढ़ घराना’ की पहचान का सफर

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बसंत राघव

किसी सांस्कृतिक परंपरा का इतिहास केवल मंच पर थिरकते पाँवों से नहीं बनता। उसके पीछे कुछ आँखें होती हैं, जो उस थिरकन में छिपी विशिष्टता को पहचानती हैं; कुछ मन होते हैं, जो उसे समझते हैं; और कुछ कलमें होती हैं, जो उस अनुभव को शब्द देकर समय की स्मृति में सुरक्षित कर देती हैं। विडंबना यह है कि मंच पर चमकने वाले नाम अक्सर इतिहास में दर्ज रह जाते हैं, जबकि उस चमक के पीछे खड़े मूल अध्येता, अन्वेषक और दस्तावेज-संग्राहक धीरे-धीरे विस्मृति के अँधेरे में चले जाते हैं। कभी-कभी तो उनकी लिखी पुस्तकों और मूल शोध-सामग्री के सहारे नई पीढ़ी अपनी विद्वत्ता का परिचय देती है, मगर उस मूल स्रोत का नाम लेना भी आवश्यक नहीं समझती।

डॉ. बलदेव का प्रसंग इसी विडंबना का एक मार्मिक उदाहरण है।

रायगढ़ की कथक परंपरा की कहानी भी इसी जटिल सांस्कृतिक यात्रा से होकर गुजरती है ,जहाँ राजाश्रय है, कलाकारों की साधना है, सृजनात्मक प्रयोग हैं, शोध है, लेखन है, विवाद है और अंततः एक ऐसी सांस्कृतिक पहचान है, जिसने रायगढ़ को देश के कला-मानचित्र पर विशिष्ट स्थान दिया।

इस पूरी यात्रा में राजा चक्रधर सिंह का नाम सबसे पहले और स्वाभाविक रूप से सामने आता है। वे केवल कला-प्रेमी शासक नहीं थे; संगीत और नृत्य के गंभीर अध्येता तथा साधक भी थे। उनके दरबार में देश के अनेक ख्यातिलब्ध कलाकार और कथक के आचार्य आए। संवाद, अभ्यास और रचनात्मक प्रयोगों के वातावरण में रायगढ़ में कथक की एक विशिष्ट परंपरा विकसित हुई। उसमें पूर्ववर्ती कथक परंपराओं की अंतर्धाराएँ थीं, किंतु साथ ही नई रचनात्मक संभावनाओं और स्थानीय सृजनशीलता के वैशिष्ट्य का अपना रंग भी था।

【’रायगढ़ घराना’ की अवधारणा और डॉ. बलदेव】

डॉ. बलदेव ने रायगढ़ में कथक की परंपरा निर्मित नहीं की थी। वह परंपरा कलाकारों, आचार्यों और राजाश्रय की दीर्घ साधना से विकसित हुई थी। उनका योगदान इस परंपरा की विशिष्टता को पहचानने, उसके तत्वों को समझने और उसे एक वैचारिक और तात्विक पहचान देने के उपक्रम में था।

इसके पीछे उनका प्रदीर्घ गंभीर अध्ययन और कलाकारों से निकट आत्मीय संवाद था। उन्होंने रायगढ़ के नर्तकों और संगीतकारों के बीच बैठकर कथक के बोल, परन, बंदिशों , नृत्य-संयोजन और उससे जुड़ी बारीकियों को सुना-समझा। उस समय उनका बहुत-सा हिस्सा लिखित दस्तावेजों में नहीं, बल्कि कलाकारों की स्मृतियों और मौखिक परंपरा में ही जीवित था। डॉ. बलदेव ने इस सामग्री को समझने और व्यवस्थित तथा विवेचित रूप में दर्ज करने का सार्थक प्रयास किया।

वर्ष 1979 में ‘रंग-संधान’ से डॉ. बलदेव को भेजे गए पत्र में उनकी रचना का विषय स्पष्ट रूप से “मध्यप्रदेश में कथक : रायगढ़ घराना” दर्ज है। पत्र में उनकी रचना के प्रकाशन की सूचना भी मिलती है। यह दस्तावेज इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि इससे संकेत मिलता है कि सन्1979 तक रायगढ़ की कथक परंपरा को ‘रायगढ़ घराना’ के रूप में देखने और प्रस्तुत करने की अवधारणा उनके लेखन में स्पष्टत: से मूर्त रूप ले चुकी थी।

इसके बाद सितंबर 1980 में ‘संगीत’ पत्रिका में उनका मूल लेख ‘कथक : रायगढ़ घराना’ प्रकाशित हुआ।

डॉ. बलदेव ने बाद में इस लेख की पृष्ठभूमि बताते हुए कहा था कि देश के अनेक प्रसिद्ध नर्तकों की प्रस्तुतियाँ देखने-परखने ,संगीत और नृत्य संबंधी साहित्य पढ़ने तथा नृत्यविदों से संवाद करने के साथ-साथ रायगढ़ के नर्तकों को देखने पर उन्हें उनकी शैली में एक पृथक विशिष्टता और नव्यता तथा भव्यता दिखाई दी। प्रसिद्ध कला-समीक्षक स्व. अनिल कुमार की प्रेरणा से उन्होंने इसी विशिष्टता और पार्थक्य पर लेख लिखा।

उनका लेख चक्रधर कला परिषद, रायगढ़ में भी पढ़ा गया। उनके अनुसार, सेठ महावीर अग्रवाल और किशन डालमिया के संयोजन में आयोजित उस अवसर पर लेख को व्यापक समर्थन मिला। बाद में भोपाल में आयोजित ‘कथक शिविर’ में भी इसका वाचन हुआ और सराहना मिली।

इस प्रकार वर्ष 1979-80 के दस्तावेज और प्रकाशन एक ऐसी बौद्धिक प्रक्रिया की ओर संकेत करते हैं, जिसमें रायगढ़ की कथक परंपरा को केवल स्थानीय कला न मानकर उसकी विशिष्ट शैलीगत पहचान के साथ समझने और उसे ‘घराना’ के रूप में परिभाषित करने का अध्यवसाय किया जा रहा था।

यहाँ यह अंतर स्पष्ट रहना चाहिए कि डॉ. बलदेव ने ‘रायगढ़ घराना’ बनाया नहीं था; उन्होंने रायगढ़ में विकसित हो रही कथक परंपरा की विशिष्टताओं को पहचानकर उसे नाम और वैचारिक आधारभूमि देने की कोशिश की थी।

【‘रायगढ़ में कथक’ और लेखकत्व का विवाद】

यहीं से इस कथा का दूसरा और अधिक जटिल पक्ष सामने आता है।

डॉ. बलदेव के मूल लेख के प्रकाशन के बाद ‘रायगढ़ में कथक’ नाम से प्रकाशित पुस्तक को लेकर लेखकत्व का विवाद तूल पकड़ा। 6–12 फरवरी 1983 के ‘दिनमान’ में प्रकाशित सतीश जायसवाल का लेख ‘रायगढ़ में कथक : असलियत क्या है?’ इस विवाद का एक महत्त्वपूर्ण समकालीन दस्तावेज है।

जायसवाल के लेख में डॉ. बलदेव साव का यह पक्ष दर्ज है कि ‘रायगढ़ में कथक’ पुस्तक की मूल रचना उनकी थी और उसका मूल शीर्षक ‘कथक : रायगढ़ घराना’ था। उनके अनुसार पुस्तक उनके मूल लेख का ही वर्णनात्मक विस्तार थी।

विवाद से संबंधित समकालीन विवरणों में यह तथ्य भी सामने आता है कि कथक के तकनीकी पक्ष—विशेषकर बोल, परन , बंदिशों और नृत्य की बारीकियों—को समझने के लिए डॉ. बलदेव ने कथक नर्तक कार्तिक राम से सहायता ली थी। दोनों के बीच लेखक और सहयोगी लेखक के रूप में नाम दिए जाने संबंधी समझ बनने की बात भी उस समय सामने आई।

लेकिन पुस्तक प्रकाशित हुई तो डॉ. बलदेव का नाम सहयोगी लेखक के रूप में नहीं था न ही उनकी लिखी भूमिका। कार्तिक राम की भूमिका प्रकाशित हुई और डॉ. बलदेव के अनुसार उनके शोध, संकलन और लेखन संबंधी योगदान को अपेक्षित स्थान नहीं मिला।

यहीं से प्रश्न केवल एक पुस्तक के लेखकत्व का नहीं रहा; उसके भीतर रचनात्मक श्रेय, बौद्धिक अधिकार और साहित्यिक नैतिकता के प्रश्न भी जुड़ गए।

इस प्रश्न को स्थानीय स्तर पर गंभीरता से उठाने वालों में डॉ. देवधर महंत का नाम भी उल्लेखनीय है। जांजगीर से प्रकाशित साप्ताहिक ‘जांजगीरज्योति’ में उनका विचारोत्तेजक लेख ‘रायगढ़ में कथक : कौन असली लेखक?’ प्रकाशित हुआ। इससे पहले ‘नवभारत’ में भी विवाद की चर्चा सामने आ चुकी थी, किंतु अब यह प्रश्न व्यापक साहित्यिक विमर्श की ओर बढ़ रहा था।

उस समय धोंधाबाबा मंदिर बिलासपुर में साहित्यकारों की नियमित बैठकें होती थीं। द्वारका प्रसाद तिवारी ‘विप्र’ के नेतृत्व में होने वाली इन बैठकों में श्यामलाल चतुर्वेदी, पालेश्वर प्रसाद शर्मा , बाबूलाल सीरिया “दुर्लभ” ,गेंद राम सागर , लक्ष्मीनारायण मिश्र,और अन्य साहित्यकार उपस्थित रहते थे। इन्हीं बैठकों में डॉ. देवधर महंत ने इस मुद्दे को व्यापक स्तर पर उठाने की आवश्यकता पर चर्चा की। डॉ. पालेश्वर प्रसाद, बाबूलाल सीरिया “दुर्लभ” ,गेंदराम सागर, लक्ष्मीनारायण मिश्र तथा उपस्थित अन्य साहित्यकारों ने इस पर सहमति व्यक्त की।

इसी क्रम में यह विषय सतीश जायसवाल तक पहुँचा। उन्होंने इसे केवल एक स्थानीय विवाद के रूप में नहीं देखा, बल्कि साहित्यिक ईमानदारी और रचनात्मक श्रेय के प्रश्न के रूप में ग्रहण किया। परिणामतः ‘दिनमान’ में उनका लेख प्रकाशित हुआ और रायगढ़ कथक तथा डॉ. बलदेव से जुड़ा विवाद राष्ट्रीय साहित्यिक-सांस्कृतिक विमर्श में पहुँच गया।

लेख प्रकाशित होते ही अनेक प्रश्न सामने आए—‘डा.बलदेव कौन हैं?’, ‘रायगढ़ घराना है भी या नहीं?’, और यदि है तो उसकी पहचान का आधार क्या है?

इस तरह लेखकत्व का विवाद धीरे-धीरे रायगढ़ कथक की अस्मिता और उसके इतिहास-लेखन के प्रश्न से जुड़ गया।

‘पूर्वग्रह’ का प्रसंग

डॉ. बलदेव के लेखन को लेकर एक अन्य विवाद भी सामने आया।

डॉ. बलदेव के अनुसार, भोपाल में मध्यप्रदेश कला परिषद द्वारा आयोजित ‘कथक प्रसंग’ में उनके लेख के वाचन को लेकर उस समय शासकीय महाविद्यालय रायगढ़ के हिंदी के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर प्रमोद वर्मा के साथ एक समझ बनी थी। उनके अनुसार, कार्यक्रम में ‘कथक : रायगढ़ घराना’ आलेख का वाचन प्रमोद वर्मा करेंगे और उससे संबंधित प्रश्नों के उत्तर डा.बलदेव स्वयं देंगे।

डॉ. बलदेव का आरोप था कि बाद में प्रमोद वर्मा अकेले भोपाल गए और वहाँ उक्त लेख का पाठ किया। उनका यह भी कहना था कि बाद में लेख में कुछ फेरबदल करके उसे मध्यप्रदेश कला परिषद की साहित्यिक पत्रिका ‘पूर्वग्रह-34’ में प्रमोद वर्मा के नाम से प्रकाशित करा दिया गया।

यह भी विवाद का विषय बना और लेखकत्व संबंधी प्रश्न को और जटिल करता गया।

【‘रायगढ़ घराना’—एक अलग बहस】

इसी बीच एक दूसरा और बुनियादी प्रश्न उठ खड़ा हुआ—क्या रायगढ़ की कथक परंपरा को स्वतंत्र ‘घराना’ कहा भी जा सकता है?

“दिनमान” में दर्ज विवरण के अनुसार
मुंबई की विख्यात पखावज वादिका डॉ. अबन मिस्त्री ने रायगढ़ को कथक का स्वतंत्र घराना मानने की अवधारणा पर प्रश्न उठाया। उनका मत था कि रायगढ़ की नृत्य-संगीत परंपरा राजपरिवार के निजी सांस्कृतिक परिवेश से आगे पर्याप्त रूप से विकसित नहीं हुई और उसमें ऐसी निरंतर गुरु-शिष्य परंपरा नहीं दिखाई देती, जिसके आधार पर उसे स्वतंत्र घराना माना जा सके।

यह मत अपने आप में एक व्यापक विमर्श का द्वार खोलता है।

‘घराना’ केवल किसी स्थान से जुड़ी कला-परंपरा का नाम नहीं है। उसके पीछे शैलीगत विशिष्टता, गुरु-शिष्य परंपरा, रचनात्मक संरचना, परंपरा की निरंतरता और उसका आगे प्रसार जैसे अनेक तत्व होते हैं। इसलिए रायगढ़ को घराना मानने या न मानने का प्रश्न केवल नामकरण का प्रश्न नहीं, बल्कि भारतीय शास्त्रीय नृत्य के इतिहास-लेखन और ‘घराना’ की अवधारणा को समझने का प्रश्न भी है।

फिर भी इस बहस से एक तथ्य स्पष्ट होता है—1980 के दशक के आरंभ तक रायगढ़ की कथक परंपरा की विशिष्टता को लेकर गंभीर सांस्कृतिक और अकादमिक विमर्श प्रारंभ हो चुका था और इस विमर्श के केंद्र में डॉ. बलदेव का लेखन भी था।

समय बीतने के साथ डॉ. बलदेव के शोध और अन्वेषण की महत्ता को रेखांकित करने वाले स्वर भी सामने आए।

डॉ. राजू पांडेय ने लिखा—

“राजा चक्रधर सिंह और रायगढ़ के कथक घराने पर उनका शोध चमत्कृत कर जाता है। रायगढ़ की साहित्यिक-सांस्कृतिक विरासत को समझने के लिए केवल एक ही रास्ता है और वह डॉ. बलदेव के अन्वेषणपरक लेखों से होकर गुजरता है।”

आलोचक नंदकिशोर तिवारी ने भी लिखा—

“रायगढ़ के सांगीतिक महत्त्व को प्रकाश में लाने का भगीरथ प्रयास डॉ. बलदेव ने किया। उन्होंने रायगढ़ के कथक के महत्त्व को दर्शाते हुए उसकी सम्यक् विवेचना की।”

इन टिप्पणियों को केवल प्रशस्ति के रूप में नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक शोध-परंपरा की स्वीकृति के रूप में भी देखा जा सकता है, जिसमें डॉ. बलदेव ने रायगढ़ की मौखिक और सांगीतिक स्मृतियों को अध्ययन का विषय बनाया।

उनकी पुस्तक ‘रायगढ़ का सांस्कृतिक वैभव’ इसी अन्वेषणशील दृष्टि का महत्त्वपूर्ण दस्तावेज है। रायगढ़ की संगीत-परंपरा, कथक और उसकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को समझने में उनका लेखन एक महत्त्वपूर्ण संदर्भ प्रस्तुत करता है।

【चक्रधर समारोह : मंच पर आई सांस्कृतिक स्मृति】

रायगढ़ की सांस्कृतिक यात्रा का अगला महत्त्वपूर्ण पड़ाव था—चक्रधर समारोह।

वर्ष 1984 में प्रथम चक्रधर समारोह का आयोजन हुआ। इसके पीछे पं. मुकुटधर पांडेय और किशोरी मोहन त्रिपाठी जैसे व्यक्तित्वों का संरक्षण और सक्रिय सहयोग था तथा तत्कालीन सांसद श्री केयूर भूषण की अध्यक्षता में आयोजन को दिशा मिली।

इस आरंभिक आयोजन को आकार देने में डॉ. बलदेव, ठाकुर वेदमणी सिंह, जगदीश मेहर, मनहरण सिंह ठाकुर, गणेश कछवाहा, रजनीकांत मेहता, गुरुदेव चौबे कश्यप, श्रीमती उर्मिला देवी, पं. बर्मन लाल,फिरतु महाराज, लाला फूलचंद श्रीवास्तव, नृत्यांगना बासंती वैष्णव और सुनील वैष्णव जैसे कला-साधकों तथा संस्कृति-प्रेमियों की भूमिका रही।

प्रथम चक्रधर समारोह केवल एक आयोजन नहीं था। वह रायगढ़ की दीर्घ सांस्कृतिक स्मृति को सार्वजनिक मंच पर प्रतिष्ठित करने की दिशा में एक निर्णायक कदम था।

आगे चलकर समारोह ने रायगढ़ की संगीत और नृत्य-संपदा को देश के व्यापक सांस्कृतिक परिदृश्य से जोड़ा। देश के विभिन्न हिस्सों से कलाकार यहाँ आने लगे। कथक, शास्त्रीय संगीत और अन्य कलाओं की प्रस्तुतियों ने रायगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को लगातार विस्तार दिया।

यहाँ डॉ. बलदेव और चक्रधर समारोह की भूमिकाओं के बीच एक महत्त्वपूर्ण अंतर दिखाई देता है।

डॉ. बलदेव ने रायगढ़ की कथक परंपरा की विशिष्टता को अध्ययन और लेखन के माध्यम से वैचारिक पहचान देने का प्रयास किया; चक्रधर समारोह ने उसी व्यापक सांस्कृतिक विरासत को मंच, दर्शक और संस्थागत निरंतरता प्रदान की।

इसलिए दोनों को एक-दूसरे का विकल्प नहीं, बल्कि रायगढ़ की सांस्कृतिक यात्रा के परस्पर पूरक पड़ावों के रूप में देखना अधिक उचित होगा।

【मौखिक परंपरा से लिखित इतिहास तक】

रायगढ़ कथक के प्रसंग में एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न मौखिक परंपरा का भी है।

कथक की अनेक रचनाएँ—बोल, परन, बंदिशें, गतें और नृत्य-संरचनाएँ—लंबे समय तक कलाकारों की स्मृति, अभ्यास और गुरु-शिष्य परंपरा में जीवित रहती हैं। उन्हें लिखित रूप में दर्ज करना केवल शब्दों को कागज पर उतार देना नहीं है। इसके लिए कलाकारों से संवाद, तकनीकी समझ, तुलना, स्मृति और संदर्भों की गहरी पड़ताल आवश्यक होती है।

डॉ. बलदेव ने इसी क्षेत्र में भरपूर काम किया। उन्होंने कलाकारों से सुना, प्रश्न किए, सामग्री जुटाई और उसे विश्लेषण- विवेचन की भाषा देने का प्रयास किया।

लेकिन यही प्रक्रिया लेखकत्व की जटिलता भी सामने लाती है।

किसी मौखिक परंपरा में स्रोत कलाकार कौन है? संकलनकर्ता कौन है? व्याख्याकार कौन है? और अंतिम लिखित रूप का लेखक किसे माना जाए?

‘रायगढ़ में कथक’ को लेकर उठा विवाद इन प्रश्नों को तीखे ढंग से हमारे सामने रखता है। इसलिए यह विवाद केवल व्यक्तिगत श्रेय का प्रसंग नहीं, बल्कि लोक और शास्त्रीय कला की मौखिक विरासत को लिखित इतिहास में दर्ज करने की पूरी प्रक्रिया पर विचार करने का अवसर भी है।
विवाद से परे इतिहास की जरूरत है—मूल दस्तावेजों तक लौटने की।

1979 का पत्र क्या कहता है?

1980 में ‘संगीत’ में प्रकाशित मूल लेख क्या प्रमाणित करता है?

‘रंग-संधान’ से संबंधित पत्राचार में क्या दर्ज है?

‘कथक प्रसंग’ और ‘पूर्वग्रह-34’ से जुड़े मूल अभिलेख क्या बताते हैं?

‘रायगढ़ में कथक’ की पांडुलिपि, भूमिका और पत्राचार में क्या दर्ज है?

और उन कलाकारों, साहित्यकारों तथा संस्कृति-साधकों के प्रत्यक्ष वक्तव्यों को किस संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिए?

इन प्रश्नों के उत्तर जितने अधिक प्राथमिक स्रोतों से मिलेंगे, रायगढ़ कथक का इतिहास उतना ही अनुमान, स्मृति और किंवदंती से निकलकर प्रमाण और शोध की भूमि पर आएगा।

【रायगढ़ कथक की यात्रा किसी एक व्यक्ति की देन नहीं है।】

राजा चक्रधर सिंह ने संरक्षण और सृजन का वातावरण दिया। अनेक आचार्यों और कलाकारों ने अपनी साधना से कथक को समृद्ध किया। कार्तिक राम,कल्याण दास, फिरतू महाराज, बर्मन लाल,बासंती वैष्णव, सुनील वैष्णव जैसे कलाकारों ने उसे मंचीय जीवन दिया। विद्वानों और शोधकर्ताओं ने उसके स्वरूप को समझने की कोशिश की। लेखकों ने उसकी स्मृतियों और रचनात्मक उपलब्धियों को शब्द दिए। बाद के सांस्कृतिक आयोजनों ने उसे व्यापक मंच प्रदान किया। चक्रधर समारोह ने तो इस विरासत को निरंतर सार्वजनिक उत्सव में बदल दिया।

【इतिहास में एक कलम का स्थान】

सांस्कृतिक इतिहास केवल उपलब्धियों की चमक से नहीं बनता। उसके पीछे अनगिनत श्रम होते हैं—किसी कलाकार का वर्षों का रियाज़, किसी गुरु का मौखिक ज्ञान, किसी संरक्षक का आश्रय, किसी शोधकर्ता की यात्राएँ, किसी लेखक की रातें और किसी दस्तावेज-संग्राहक की धैर्यपूर्ण खोज।

इनमें से कुछ नाम मंच पर दिखाई देते हैं, कुछ इतिहास की किताबों में और कुछ धीरे-धीरे स्मृति से ओझल हो जाते हैं।

डॉ. बलदेव का प्रसंग हमें इसी विस्मृति से सावधान करता है।

रायगढ़ कथक घराने की चर्चा जब भी हो, चक्रधर समारोह की भव्यता जब भी सामने आए, राजा चक्रधर सिंह और रायगढ़ के कलाकारों का स्मरण जब भी किया जाए, उस इतिहास के एक कोने में डॉ. बलदेव की वह कलम भी दिखाई देनी चाहिए, जिसने उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार 1979 में ही रायगढ़ की कथक परंपरा की विशिष्टता को ‘रायगढ़ घराना’ के रूप में देखने की स्पष्ट पहल की और 1980 में प्रकाशित ‘कथक : रायगढ़ घराना’ के माध्यम से उसे साहित्यिक-सांस्कृतिक विमर्श में व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया। ‘दिनमान’ जैसी पत्रिकाओं में छपा उनका लेख राष्ट्रीय ही नहीं अन्तर्राष्ट्रीय चर्चा के विषय रहे।

लेकिन इस दावे की ऐतिहासिक पुष्टि भी भावनाओं से नहीं, प्रमाणों से ही होगी। तारीखें, मूल पांडुलिपियाँ, पत्राचार, समकालीन प्रकाशन और प्रत्यक्ष दस्तावेज ही यह निर्धारित कर सकते हैं कि किसने क्या किया, कब किया और किस रूप में किया।

यही कारण है कि डॉ. बलदेव के योगदान का पुनर्मूल्यांकन करते समय उनके पक्ष में उपलब्ध प्रमाणों को सामने रखना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है उनसे जुड़े विवादों और दूसरे पक्षों को भी ईमानदारी से दर्ज करना।

किसी कलाकार की महानता स्वीकार करने के लिए किसी अध्येता के श्रम को नकारना आवश्यक नहीं है। उसी तरह किसी शोधकर्ता के बौद्धिक योगदान को स्वीकार करने का अर्थ यह भी नहीं कि उस परंपरा को अपने शरीर, लय और साधना से जीवित रखने वाले कलाकारों के योगदान को कम आँका जाए।

यही उस यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि है कि उसने कला को केवल प्रदर्शन नहीं रहने दिया; उसे इतिहास, शोध और विमर्श का विषय बनाया।

और शायद यही किसी जीवित सांस्कृतिक परंपरा की पहचान भी है—वह समय के साथ केवल मंच पर नहीं बदलती, वह प्रश्नों में भी बदलती है, बहसों में भी, दस्तावेजों में भी और स्मृति में भी।

रायगढ़ कथक घराने के इतिहास में डॉ. बलदेव का महत्त्व इसी बिंदु पर सबसे अधिक स्पष्ट होता है—उन्होंने एक जीवित कला-परंपरा में छिपी विशिष्टता को पहचाना, उसे शोध की दृष्टि से देखा और उसकी पहचान को शब्द देने का प्रयास किया।

इतिहास का दायित्व अब इतना ही है कि उस प्रयास को न अतिशयोक्ति में बदले, न विस्मृति में जाने दे—बल्कि प्रमाणों के प्रकाश में उसका उचित स्थान निर्धारित करे।

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