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थाने की कस्टडी में गुल्लू की मौत का सवाल: गरीब परिवार को न्याय कब मिलेगा?

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-चांपा थाना घेराव के बीच उठे गंभीर सवाल,
-पुलिस-प्रशासन से निष्पक्ष जांच और जवाबदेही की मांग

जिला जांजगीर-चांपा। चांपा थाना परिसर में एक युवक/बालक गुल्लू की कथित कस्टडी में मौत का मामला बेहद गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। मृतक के माता-पिता और पत्नी सहित परिजन न्याय की मांग को लेकर थाना घेराव कर बैठे हैं। दूसरी ओर, स्थिति को देखते हुए जिला पुलिस प्रशासन द्वारा बड़ी संख्या में पुलिस बल की तैनाती की सूचना सामने आ रही है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर एक गरीब परिवार अपने बेटे की मौत का सच जानने के लिए दर-दर भटकने को क्यों मजबूर है?

यह मामला केवल एक परिवार के दुख का मामला नहीं है, बल्कि पुलिस हिरासत में किसी व्यक्ति की सुरक्षा और उसके जीवन की जिम्मेदारी से जुड़ा अत्यंत संवेदनशील प्रश्न है। यदि गुल्लू पुलिस अभिरक्षा में था और उसी दौरान उसकी मौत हुई, तो मौत की परिस्थितियों की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच होना बेहद जरूरी है। किसी भी पक्ष को जांच से पहले दोषी ठहराना उचित नहीं होगा, लेकिन सवालों को दबाना भी न्याय के हित में नहीं हो सकता।

परिजनों के सवालों का जवाब कौन देगा?

गुल्लू के माता-पिता और पत्नी का दर्द समझना होगा। जिस परिवार ने अपने सदस्य को पुलिस के हवाले किया हो, यदि उसकी मौत की खबर मिले तो परिवार के मन में स्वाभाविक रूप से अनेक *सवाल उठेंगे—

गुल्लू की तबीयत कब बिगड़ी?
उसे समय पर चिकित्सा सुविधा मिली या नहीं?
थाने में उसके साथ क्या हुआ?
वह किस परिस्थिति में घायल या बीमार हुआ?
पुलिस अभिरक्षा के दौरान मौजूद अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका क्या थी?
थाने के सीसीटीवी कैमरों में क्या रिकॉर्ड हुआ?
मेडिकल जांच और पोस्टमार्टम में क्या सामने आया?
इन सभी सवालों का जवाब जांच के माध्यम से सामने आना चाहिए।

पुलिस बल की तैनाती से ज्यादा जरूरी है विश्वास बहाली

कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस की जिम्मेदारी है, लेकिन किसी दुखी परिवार की न्याय की मांग को केवल भीड़ या सुरक्षा व्यवस्था के चश्मे से देखना समस्या का समाधान नहीं है। पुलिस बल तैनात करने से ज्यादा जरूरी है कि पीड़ित परिवार के मन में न्याय व्यवस्था के प्रति विश्वास कायम किया जाए।

यदि प्रशासन के पास तथ्य हैं तो उन्हें पारदर्शी तरीके से सामने लाया जाना चाहिए। यदि कहीं पुलिसकर्मियों की लापरवाही सामने आती है तो नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। और यदि जांच में पुलिस की भूमिका संदिग्ध नहीं पाई जाती है, तब भी निष्पक्ष जांच के परिणाम सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किए जाने चाहिए।

गरीब की आवाज कमजोर क्यों समझी जाए?
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे संवेदनशील पहलू यह है कि मामला एक साधारण परिवार से जुड़ा बताया जा रहा है। गरीब परिवार के पास न बड़ी राजनीतिक ताकत होती है और न ही प्रभावशाली लोगों तक पहुंच। ऐसे परिवार की न्याय की लड़ाई लंबी और कठिन हो जाती है।

लेकिन लोकतंत्र में न्याय व्यक्ति की आर्थिक स्थिति देखकर नहीं मिलता। अमीर हो या गरीब, प्रभावशाली हो या सामान्य नागरिक—कानून की नजर में हर जीवन का समान मूल्य होना चाहिए।

सरकार तत्काल उठाए ठोस कदम
इस मामले में शासन-प्रशासन को संवेदनशीलता दिखाते हुए तत्काल:
पूरे मामले की निष्पक्ष एवं स्वतंत्र जांच कराई जाए।

पोस्टमार्टम की प्रक्रिया पारदर्शी रखी जाए और वीडियोग्राफी कराई गई हो तो उसका सुरक्षित रिकॉर्ड रखा जाए।
थाने एवं संबंधित स्थानों के सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित किए जाएं।

घटना के समय थाने में मौजूद पुलिसकर्मियों एवं अन्य संबंधित व्यक्तियों के बयान दर्ज किए जाएं।
मृतक के परिजनों के बयान स्वतंत्र रूप से दर्ज किए जाएं।

यदि जांच में किसी अधिकारी या कर्मचारी की लापरवाही अथवा अपराध सामने आता है तो उसके खिलाफ कठोर वैधानिक कार्रवाई की जाए।

पीड़ित परिवार को नियमानुसार आर्थिक सहायता और आवश्यक सुरक्षा उपलब्ध कराई जाए।
जांच की प्रगति से परिवार को नियमित रूप से अवगत कराया जाए।

न्याय केवल जांच का आदेश नहीं, परिणाम भी मांगता है
गुल्लू की मौत के मामले में सबसे बड़ी जरूरत किसी पक्ष को जल्दबाजी में दोषी ठहराने की नहीं, बल्कि सच्चाई सामने लाने की है। निष्पक्ष जांच ही यह तय करेगी कि आखिर मौत किन परिस्थितियों में हुई और इसके लिए जिम्मेदारी किसकी बनती है।

आज गुल्लू का परिवार न्याय की चौखट पर खड़ा है। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि गुल्लू की मौत कैसे हुई—सवाल यह भी है कि क्या उसके परिवार को बिना किसी दबाव, भय और भेदभाव के न्याय मिलेगा?
शासन-प्रशासन को यह समझना होगा कि किसी गरीब परिवार का आक्रोश तब और बढ़ता है, जब उसे लगता है कि

उसकी आवाज सुनने वाला कोई नहीं है। इसलिए इस मामले को संवेदनशीलता के साथ तत्काल उच्चस्तरीय निगरानी में लिया जाना चाहिए।

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