-हरियाली के नाम पर घोर लापरवाही – बालोद कलेक्टर के दिए पौधे कचरे में फेंके, सूखने की कगार पर
शब्बीर कुरैशी/दल्ली राजहरा –
एक तरफ छत्तीसगढ़ शासन हरियाली और पर्यावरण संरक्षण के लिए लाखों करोड़ों रुपए खर्च कर रही है, तो वहीं दूसरी तरफ दल्ली राजहरा की मुख्य नगर पालिका अधिकारी शासन के मंसूबों पर पलीता लगा रही हैं। इसका ताजा उदाहरण नगर पालिका परिसर की यह तस्वीर है।
बताया जा रहा है कि बालोद कलेक्टर द्वारा दल्ली राजहरा नगर पालिका को लाखों रुपए के पौधे पौधारोपण के लिए दिए गए थे। ताकि शहर हरा-भरा रहे और पर्यावरण सुधरे। लेकिन जिम्मेदार अधिकारी की लापरवाही के चलते सैकड़ों पौधे नगर पालिका के पिछले हिस्से में कचरे और कीचड़ में फेंक दिए गए हैं।

तस्वीरों में साफ देखा जा सकता है कि कैसे काली पॉलिथीन में लगे छोटे-छोटे पौधे गंदगी वाली जगह पर बिखरे पड़े हैं। कुछ पौधे सूखने लगे हैं तो कुछ कीचड़ में दब गए हैं। नगर पालिका की गाड़ी के नीचे और दीवार के किनारे इन्हें बेदर्दी से फेंक दिया गया है।
यह सिर्फ पौधों की बर्बादी नहीं, बल्कि शासन के लाखों रुपए के पैसे की सीधी बर्बादी है। एक पौधे को तैयार करने में वन विभाग की मेहनत और सरकारी पैसा दोनों लगता है। लेकिन सीएमओ की निष्क्रियता के कारण सब कुछ बर्बाद हो रहा है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि मुख्य नगर पालिका अधिकारी सिर्फ एसी दफ्तर में बैठकर शासन के पैसे को बर्बाद करने का काम कर रही हैं। शहर में विकास के नाम पर कुछ नहीं हो रहा। पौधारोपण के नाम पर सिर्फ कागजों में खानापूर्ति की जा रही है।
पर्यावरण प्रेमियों में इसको लेकर भारी आक्रोश है। उनका कहना है कि जब अधिकारी ही पौधों को कचरे में फेंक देगी तो आम जनता से हरियाली की उम्मीद कैसे की जा सकती है। यह कलेक्टर के आदेश की भी अवहेलना है।
नगर पालिका परिषद का काम शहर को स्वच्छ और सुंदर बनाना है, लेकिन यहां तो उल्टा हो रहा है। जहां पौधे लगने चाहिए थे, वहां गंदगी का अंबार है और जहां पौधे हैं, उन्हें कचरे में तब्दील कर दिया गया है।
जनता ने मांग की है कि इस पूरे मामले की जांच बालोद कलेक्टर को करनी चाहिए। आखिर इतने महंगे पौधे किसके कहने पर कचरे में फेंके गए? इसकी जवाबदेही मुख्य नगर पालिका अधिकारी की तय होनी चाहिए और बर्बाद हुए शासकीय पैसे की वसूली उनसे की जानी चाहिए।
फिलहाल यह तस्वीरें नगर पालिका की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा कर रही हैं और यह साबित कर रही हैं कि अधिकारी को न तो शासन की परवाह है और न ही पर्यावरण की।







