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पुस्तक समीक्षा – ‘दिनकर विमर्श’ डॉ. पूनम माटिया का शोध-लेख- ‘उर्वशी में मनोवैज्ञानिक तत्व’…

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संवाददाता – लक्ष्मी नारायण लहरे
“मन से रहता साथ मेरे या वो केवल तन से ?
असमंजस में रात गुजारी मैने कितनी बार ।”
हाल ही में एक उत्कृष्ट कृति हाथ लगी – ‘दिनकर विमर्श’। यह पुस्तक मुझे दिल्ली से सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. पूनम माटिया  ने भेजी है।
उल्लेखनीय है कि राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी की 117वीं जयंती के उपलक्ष्य में 5-6 अक्टूबर, 2025 को अलीगढ़ में एक अंतरराष्ट्रीय शोध-संगोष्ठी आयोजित हुई थी। उसी संगोष्ठी में पठित शोध-पत्रों और आलेखों का प्रामाणिक संकलन है यह ग्रंथ। इसका कुशल संपादन किया है ।
डॉ. दिनेश कुमार शर्मा  और डॉ. पूनम माटिया  ने। डॉ. शर्मा  अलीगढ़ में निवास करते हैं और दिनकर-साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान हैं। ‘मिथक और दिनकर’, ‘राष्ट्रकवि दिनकर : विविध आयाम’, ‘दिनकर : एक शताब्दी’, ‘दिनकर : साहित्य साधना’ जैसी उनकी कृतियां इस बात का प्रमाण हैं।
डॉ. पूनम माटिया  को मैं व्यक्तिगत रूप से वर्षों से जानता हूं। वे एक सशक्त कवयित्री, लेखिका, कुशल मंच संचालिका होने के साथ-साथ समाज सेविका और गौ-सेविका भी हैं। दिनकर जी के साहित्य में उनकी गहरी, आत्मीय रुचि है।
23 अगस्त, 2026 को वे रायपुर (छत्तीसगढ़) में आयोजित अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में बतौर कवयित्री पधारी थीं। वहीं साहित्यिक चर्चा के दौरान उन्होंने इस पुस्तक का जिक्र किया था और अपने वादे के अनुसार उन्होंने यह पुस्तक मुझे भेजी, जिसका मैंने अध्ययन शुरू किया है।
इस पुस्तक में पूनम जी का एक शोधपरक आलेख है- ‘उर्वशी में मनोवैज्ञानिक तत्व’। इस लेख को तैयार करने में उन्होंने सचमुच पसीना बहाया है। अंत में दी गई संदर्भ-सूची में उन्होंने बाकायदा 56 स्रोत-ग्रंथों का उल्लेख किया है। विशेष बात यह है कि उन्होंने प्राप्त सामग्री को केवल संकलित नहीं किया, बल्कि उसे आत्मसात कर इस कौशल से पिरोया है कि यह शोध-लेख एक मौलिक कृति का आनंद देने लगता है।
शोध में एक जगह बड़ा मार्मिक प्रसंग आता है, जब उर्वशी अपने प्रेमी पुरुरवा के संबंध में स्वयं से पूछती है-
मन से रहता साथ मेरे या वो केवल तन से?
असमंजस में रात गुजारी मैंने कितनी बार।
इस प्रसंग पर पूनम  को अपनी ही एक गजल का स्मरण हो आता है और वे उसका उल्लेख कर देती हैं। इस एक आत्मीय स्पर्श से लेख में रोचकता आ गई है और यह पता चलता है कि लेखिका ने केवल तथ्य और आंकड़े ही एकत्र नहीं किए, बल्कि वह स्वयं भी पूरे वजूद के साथ, पूरी तल्लीनता के साथ वहां मौजूद हैं।
शोध एक जटिल और श्रमसाध्य कार्य है, बशर्ते वह ईमानदारी से किया जाए। पूनम जी का यह ईमानदार प्रयास है। इसे पढ़ते हुए लगता ही नहीं कि हम कोई शोध-लेख पढ़ रहे हैं, लगता है जैसे वे अपनी ही कृति में पुरुरवा और उर्वशी की कथा सुना रही हों। उन्होंने दिनकर की ‘उर्वशी’ के साथ पूरा न्याय किया है। मेरा विश्वास है कि उनका यह लेख उन अनेक पाठकों को भी दिनकर की ‘उर्वशी’ पढ़ने के लिए अवश्य प्रेरित करेगा, जिन्होंने अब तक उसका रसास्वादन नहीं किया है।
पुस्तक में कई प्रकांड विद्वानों और विदुषियों के आलेख हैं। डॉ. अखिलेश चंद्र गौड़, ममता कुमारी, डॉ. सोमवती शर्मा, डॉ. अजय कुमार झा, डॉ. पुरुषोत्तम पाटील, डॉ. अशोक कुमार प्रामाणिक, डॉ. सौरभ कौशल, डॉ. जंग बहादुर पांडेय, रेखा रानी राय, डॉ. शुभदा पांडे सहित पुस्तक में संकलित सभी विद्वानों के आलेख पढूंगा। इतनी अच्छी पुस्तक उपलब्ध कराने के लिए पूनम जी का आभारी हूं।
– राजकुमार धर द्विवेदी
वरिष्ठ पत्रकार ,साहित्यकार रायपुर

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