कोंडागांव, 6 नवंबर 2026
लोक शिक्षण संचालनालय (DPI), छत्तीसगढ़ द्वारा आज सेवारत शिक्षकों के लिए टीईटी (TET) परीक्षा का पाठ्यक्रम और निर्देश जारी कर दिया गया है। इस आदेश के तहत दशकों से अपनी अमूल्य सेवाएं दे रहे अनुभवी शिक्षकों पर अनिवार्य रूप से पात्रता परीक्षा थोपी जा रही है। यह फरमान शिक्षा के अधिकार (RTE) अधिनियम के मूल प्रावधानों और विधिक न्याय का सीधा उल्लंघन है, जिसका आम शिक्षक समाज कड़ा विरोध करता है।
इस पूरे प्रकरण में आरटीई एक्ट की अनदेखी, शासन की घोर प्रशासनिक लापरवाही और शिक्षकों को प्रताड़ित करने की स्पष्ट मंशा को लेकर निम्नलिखित तथ्य ध्यानाकर्षण के योग्य हैं:
1. आरटीई (RTE) 2009 और 2014 के न्यायालयीन निर्णय का दोहरा मापदंड
जब 7 मई 2014 को माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट फैसला दिया था कि आरटीई एक्ट 2009 के प्रावधान अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों पर लागू नहीं होते हैं, तो 15-20 वर्षों से निरंतर अपना जीवन खपा रहे अनुभवी शिक्षकों पर बिना किसी स्पष्ट विधिक आधार के यह नियम क्यों थोपा जा रहा है?
2. संशोधन राजपत्र 2017 की वास्तविकता
10 अगस्त 2017 के राजपत्र (RTE Amendment Act, 2017) में स्पष्ट प्रावधान था कि जो शिक्षक 31 मार्च 2015 तक नियुक्त होकर कार्यरत थे, उन्हें 31 मार्च 2019 तक केवल न्यूनतम प्रशिक्षण योग्यता (बी.एड., डी.एड. या डी.एल.एड.) अर्जित करनी थी। इस राजपत्र में कहीं भी यह उल्लेख नहीं है कि दशकों पूर्व नियुक्त सेवारत शिक्षकों के लिए टीईटी (TET) भी अनिवार्य होगा।
3. शासन की विफलता और 2025 का न्यायालयीन आदेश
1 सितंबर 2025 को माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट निर्देश दिया था कि गैर-टीईटी उत्तीर्ण शिक्षकों के लिए प्रतिवर्ष न्यूनतम 02 बार शिक्षक पात्रता परीक्षा का विशेष आयोजन किया जाए। परंतु राज्य सरकार ने इसका घोर उल्लंघन करते हुए 2025-2026 के बीच कोई परीक्षा आयोजित नहीं की।
जब सरकार ने स्वयं न्यायालय के आदेश का पालन नहीं किया, तो अपनी इस प्रशासनिक विफलता का खामियाजा वह शिक्षकों की पदोन्नति रोक कर क्यों वसूल रही है?
4. डीपीआई का मानसिक प्रताड़ना वाला आदेश
वर्तमान निर्देश के अनुसार, कक्षा 1 से 8 तक के ऐसे सभी सेवारत शिक्षक जिनकी सेवा अवधि 5 वर्ष या उससे अधिक शेष है, उन्हें सेवा में बने रहने या पदोन्नति हेतु टीईटी उत्तीर्ण करना अनिवार्य कर दिया गया है।
यह परीक्षा दिसंबर-जनवरी में निजी कंपनी के माध्यम से कंप्यूटर आधारित (CBT) ली जाएगी, जो इस उम्र में शिक्षकों पर केवल मानसिक दबाव बनाने का एक षड्यंत्र है।
5. न्याय के नाम पर शिक्षकों का शोषण
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को शिक्षकों के खिलाफ पदोन्नति रोकने या सेवा से बाहर करने जैसा कड़ा रुख अपनाने का कोई निर्देश नहीं दिया था। लेकिन वर्तमान स्थिति से स्पष्ट है कि शासन अपनी गलतियों को छिपाने के लिए शिक्षकों को बलि का बकरा बना रहा है।
6. शिक्षक नेताओं का खोखलापन
शिक्षकों के हकों की रक्षा का दंभ भरने वाले तथाकथित नेता केवल राजनीतिक भ्रमण और स्वयं को श्रेष्ठ साबित करने की होड़ में लगे हैं। आम शिक्षक इस तानाशाही व्यवस्था में बिल्कुल अकेला फँसकर रह गया है।
शिक्षक समाज के नाम स्पष्ट संदेश
इस ज्वलंत विषय पर अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए श्री रामचंद्र सोनवंशी ने कहा:
“हम अनुभवी शिक्षक परीक्षा देने से नहीं घबराते हैं। हम परीक्षा देंगे! लेकिन दशकों की समर्पित सेवा के बाद अचानक थोपे गए इस तुगलकी नियम, आरटीई के राजपत्रों की अनदेखी और शासन की अपनी गलतियों का बोझ शिक्षकों पर डालने के खिलाफ हमारा वैचारिक संघर्ष जारी रहेगा। हमारे शिक्षक नेताओं की अंतरात्मा क्या सोचती है, यह अब भगवान भरोसे है, इसलिए अब शिक्षकों को न्याय की अपनी यह लड़ाई स्वयं लड़नी होगी।”







