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पुत्रदा एकादशी पर विशेष: संतान सुख की कामना का पावन दिन

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हिंदू पंचांग के अनुसार, हर साल श्रावण और पौष माह में दो पुत्रदा एकादशी आती हैं। इन दोनों एकादशियों का विशेष महत्व है, लेकिन श्रावण शुक्ल पक्ष की एकादशी को अधिक पुण्यदायिनी माना जाता है। इस एकादशी को “पुत्रदा एकादशी” इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस दिन व्रत-पूजन करने से संतान प्राप्ति और संतान की सुख-समृद्धि की कामना पूरी होती है।

पौराणिक महत्व:
पुराणों के अनुसार, पुत्रदा एकादशी का व्रत विशेष रूप से उन दंपतियों के लिए फलदायी होता है जिन्हें संतान सुख की प्राप्ति नहीं हो रही हो। धर्मराज युधिष्ठिर द्वारा भगवान श्रीकृष्ण से पूछे गए प्रश्न के उत्तर में श्रीकृष्ण ने इस व्रत का महत्व बताया था। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने वाले को संतान सुख के साथ ही मोक्ष की प्राप्ति भी होती है।

व्रत विधि:
– व्रती को प्रातः काल स्नान कर व्रत का संकल्प लेना चाहिए।
– भगवान विष्णु की विधिवत पूजा करनी चाहिए।
– फल, तुलसी दल, पंचामृत आदि से पूजन करें।
– रात्रि जागरण कर ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप करें।
– अगले दिन द्वादशी को व्रत का पारण करें और ब्राह्मणों को भोजन व दान दें।

आध्यात्मिक लाभ:
पुत्रदा एकादशी केवल संतान की कामना तक सीमित नहीं है। यह व्रत व्यक्ति के जीवन में आध्यात्मिक शुद्धि, मानसिक शांति और पारिवारिक सुख-शांति भी प्रदान करता है।

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